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Tuesday 19 March 2013

न्याय व्यवस्था में सुधारों की आवश्यकता


न्याय के बारे में एक पुरानी अंग्रेजी कहावत है- ‘न्याय में देरी करना न्याय को नकारना है और न्याय में जल्दबाजी करना न्याय को दफनाना है।’ वर्तमान भारतीय न्याय व्यवस्था के बारे में इस कहावत का पहला भाग ज्यादा सही है। हमारी अदालतें मुकदमों के भारी बोझ से दबी हुई हैं। एक-एक मामला कई-कई वर्षों तक चलता रहता है और कई बार फिर भी वादी को न्याय नहीं मिल पाता। इसलिए बहुत से लोग अन्याय को सहन कर जाते हैं और न्याय के लिए न्यायालय का द्वार इसलिए नहीं खटखटाते कि न्याय के मिलने की कोई गारंटी नहीं है और यदि मिला भी तो उसमें इतना व्यय हो जायेगा, जो न्याय पाने के लाभ से कई गुना अधिक होगा।

प्रश्न उठता है कि इसका समाधान क्या है? हर समस्या का कोई न कोई समाधान अवश्य होता है, यदि उस समस्या को गहराई से समझ लिया जाये। भारत की न्याय व्यवस्था की समस्याओं का सबसे बड़ा कारण मामलों की संख्या अधिक होना नहीं है, बल्कि मामलों का शीघ्र निस्तारण न करना है। इसके लिए सबसे अधिक दोषी वे वकील हैं जो मामूली बहानों से तारीखों पर तारीखें लेते जाते हैं। इनके साथ वे न्यायाधीश भी दोषी हैं, जो पर्याप्त कारण के बिना तारीखें दे देते हैं और मामला लम्बा खिंचता चला जाता है।

यदि हमें न्याय व्यवस्था को पटरी पर लाना है, तो सबसे पहले तारीखें लेने-देने की प्रवृत्ति पर रोक लगानी होगी। इसके लिए हमें वादी और प्रतिवादी दोनों पक्षों के लिए समय लेने (टाइम आउट) की अधिकतम संख्या तय करनी होगी। यह संख्या तीन रखना उचित होगा। किसी भी पक्ष को तीन से अधिक बार तारीख लेने का अधिकार नहीं होना चाहिए। यदि वे इतनी बार समय लेने पर भी पर्याप्त सबूत प्रस्तुत करने में असफल रहते हैं, तो उपलब्ध सबूतों के आधार पर मामले में निर्णय दे देना चाहिए।

यदि वादी या प्रतिवादी पक्ष में एक से अधिक व्यक्ति या समूह हों, तो केवल मुख्य वादी और मुख्य प्रतिवादी को समय लेने का अधिकार होना चाहिए। अन्य वादी या प्रतिवादी मुख्य वादी या प्रतिवादी से इस विषय में बात कर सकते हैं और आपस में मिलकर निर्णय कर सकते हैं।

यदि कोई पक्ष वादी या प्रतिवादी निर्धारित तारीख पर किसी भी कारणवश उपस्थित होने में असमर्थ रहता है, तो यह माना जाना चाहिए कि उन्होंने एक बार समय ले लिया है, अर्थात् समय लेने की संख्या में एक की कमी कर देनी चाहिए। यदि ऐसे सभी अवसर समाप्त हो गये हैं, तो वादी या प्रतिवादी की अनुपस्थिति में ही मामले का निस्तारण कर देना चाहिए।

वैसे आवश्यक होने पर न्यायाधीश अपने विवेक से दोनों पक्षों को समय दे सकता है, परन्तु इस अधिकार का उपयोग विशेष परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए और उसके कारणों को नियमानुसार लिखा जाना चाहिए। सामान्यतया न्यायाधीश को किसी भी मामले की सुनवाई रोज या निकटतम उपलब्ध तिथि को करनी चाहिए।

यदि हमारी न्याय व्यवस्था में इतना सुधार कर दिया जाये, तो यह निश्चित है कि मुकदमों का निस्तारण शीघ्र होगा और वादी को उचित समय अवधि में उचित न्याय मिल सकेगा।

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