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Sunday, 15 May 2016

नभाटा ब्लॉग पर मेरे दो वर्ष - 8

नभाटा में अपने ब्लॉग पर लेख लिखते हुए उन पर आने वाली टिप्पणियों से मुझे पता चलता था कि अधिकांश लोगों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में बहुत सतही जानकारी है और कई बार तो वह भी गलत है. इसलिए मैंने संघ के बारे में लेखों की एक श्रृंखला लिखना तय किया. इन लेखों को अच्छा प्रत्युत्तर मिला. इनमें से कुछ का लिंक दे रहा हूँ.
संघ निर्माता डा. केशव बलीराम हेडगेवार
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/…/%E0%A4%B…
संघ की स्थापना: क्यों और कैसे
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/…/%E0%A4%B…
द्वितीय सरसंघचालक परमपूज्य श्री गुरुजी
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/…/%E0%A4%A…
संघ विचार परिवार
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/…/%E0%A4%B…
संघ की शाखा में क्या होता है?
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/…/%E0%A4%B…
इन सभी लेखों पर बड़ी संख्या में टिप्पणियाँ आई थीं, जिनमें से अधिकांश समर्थन में थीं और कुछ विरोध में भी थीं जिनका मैंने उचित उत्तर दिया.
मैंने संघ के बारे में बहुत से भ्रमों का निराकरण करने का प्रयास किया था. जिसमें में सफल रहा.
वैसे बीच बीच में मैं अन्य सामयिक और सामाजिक विषयों पर भी लिखता रहता था.
विजय कुमार सिंघल
वैशाख शुक्ल 9, सं. 2073 वि.

Thursday, 12 May 2016

नाभि टलने का सरल उपचार

कई बार किसी किसी की नाभि अपनी जगह से हट जाती है जिसे नाभि टलना कहते हैं। जब वह ऊपर की ओर टलती है तो कब्ज, पेट दर्द, बेचैनी आदि होती है और जब वह नीचे की ओर टलती है तो पेट दर्द के साथ दस्त हो जाते हैं। इन दोनों का एक ही सरल उपचार है जिससे मिनटों में बिना किसी दवा के नाभि को सही स्थान पर बैठाया जा सकता है।
सबसे पहले रोगी को ज़मीन पर कोई दरी या चादर बिछाकर पेट के बल लिटा दीजिए। उसके हाथों को सामने इस तरह रखवाइए कि उस पर सिर सीधा टिक जाये और नाक ज़मीन से न टकराये। अब रोगी के बग़ल में इस तरह खड़े हो जाइये कि उसके पैर आपके दायें हाथ ओर रहें।
अब अपना बायाँ पैर रोगी की कमर पर रखिए और ंदायें हाथ से उसका एक पैर उठाइए। पैर से रोगी की कमर को दबाये रखकरश रोगी के पैर को पीछे की ओर दबाइए। पैर लम्बा रखना चाहिए। ऐसा दो तीन बार कीजिए। इसी तरह दूसरे पैर को उठाकर पीछे दबाइए। अंत में दोनों पैरों को एक साथ उठाकर पीछे की ओर दबाइए।
अब रोगी को चित लिटा दीजिए। ऐसा करने से थोडी देर में ही नाभि अपने सही स्थान पर आ जाएगी।
यदि आपकी अपनी नाभि टल गयी है तो भुजंगासन और धनुरासन बारी बारी से कीजिए।
नाभि टलने की पहचान
इससे या तो बहुत तेज़ पतले दस्त होते हैं या पेट में बहुत भयंकर दर्द अचानक होने लगता है। अगर गैस नहीं है तो अवश्य ही नाभि टल गयी होती है।
नाभि के ऊपर अगर हम हाथ का अंगूठा हल्का दबा कर देखेगें तो हमे धडकन के धडकने जैसा महसूस होगा। मगर नाभि टलने पर ये महसूस नही होगा। एवं नाभि जिस तरफ जगह छोडकर गयी है उस जगह पर वही धडकन के जैसा महसूस होगा।
ये भी नाभि टलने का पता लगाने का एक तरीक़ा है।
विजय कुमार सिंघल
वैशाख शु. ५, सं २०७३ वि

टहलना

यह सर्वोत्तम व्यायाम है। यह हर उम्र के व्यक्तियों द्वारा हर जगह किया जा सकता है और इसका कोई कुप्रभाव भी कभी दृष्टिगोचर नहीं होता। यदि यह नियमित किया जाये तो लाभ ही लाभ मिलता है और यदि कभी-कभी छूट जाये तो भी हानि नहीं होती।
प्रातःकाल का समय टहलने के लिए सर्वोत्तम है, क्योंकि उस समय हवा में आक्सीजन सबसे अधिक होती है, वातावरण शुद्ध और आनन्ददायक होता है और शान्ति भी होती है। सूर्योदय से एक घंटा पहले से लेकर एक घंटा बाद तक का समय टहलने के लिए सर्वश्रेष्ठ है। यदि किसी कारणवश प्रातःकाल न टहल सकते हों, तो सायंकाल सूर्यास्त के समय पर टहला जा सकता है।
टहलना प्रायः हर मौसम में किया जा सकता है, लेकिन यदि अत्यधिक ठंड हो, बारिश हो रही हो, कोहरा हो, तेज हवा या आँधी चल रही हो या अन्य कोई कारण हो, तो टहलने के लिए न निकलना ही अच्छा है। इसके स्थान पर उस दिन जाॅगिंग (एक ही स्थान पर खड़े-खड़े दौड़ना) अथवा अंग व्यायाम कर लेने चाहिए, जिनके बारे में अन्यत्र बताया गया है।
टहलने के लिए कोई पार्क या नदी का किनारा हो, तो बेहतर है। यदि यह उपलब्ध न हो, तो ऐसी चौड़ी सड़कों पर भी टहला जा सकता है, जहाँ पेड़ हों और टैम्पो, मोटरगाड़ियों आदि का प्रदूषण न हो।
टहलते समय कपड़े मौसम के अनुकूल, परन्तु ढीले और हलके होने चाहिए। पैरों में रबड़ की चप्पलें हों तो बेहतर, जाड़ों में कपड़े के जूते पहनकर भी टहला जा सकता है। भारी जूते पहनकर टहलना उचित नहीं। टहलते समय शरीर सीधा रहना चाहिए और चाल तेज होनी चाहिए, जैसे कहीं जाने की जल्दी हो। गहरी साँसें लेना बहुत लाभदायक रहता है।
टहलते समय आप प्राणायाम भी कर सकते हैं। इससे टहलने का लाभ कई गुना बढ़ जाता है। इसकी विधि यह है कि चार कदम चलने तक साँस भरनी चाहिए और फिर छः कदम चलने तक साँस निकालनी चाहिए। इस प्रकार लयपूर्वक साँस लेते रहने से प्राणायाम होता रहता है। इस गिनती को आप अपनी सुविधा और क्षमता के अनुसार कम या अधिक कर सकते हैं। मूल बात यह है कि साँस लेने और छोड़ने में एक लय होनी चाहिए। टहलते समय साँस को कभी-भी रोकना नहीं चाहिए।
टहलना प्रतिदिन एक किलोमीटर से प्रारम्भ करना चाहिए और प्रति सप्ताह आधा किलोमीटर बढ़ाते हुए अपनी शक्ति और सुविधा के अनुसार तीन से पाँच किलोमीटर तक प्रतिदिन टहलना चाहिए।
विजय कुमार सिंघल
वैशाख कृ १२, सं २०७३ वि.

वृद्धावस्था में सुनने की समस्या का समाधान

बढ़ती उम्र के साथ हमारे शरीर के सभी अंग एक सीमा के बाद शिथिल हो जाते हैं। हाथ पैर काँपना, दिखाई कम देना, सुनाई कम देना, वाणी लड़खड़ा जाना, पाचन शक्ति मंद हो जाना, कमर झुक जाना, झुर्रियां पड़ना आदि कुछ अनिवार्य लक्षण हैं जो कम या अधिक मात्रा में प्रत्येक व्यक्ति में उत्पन्न हो जाते हैं। इनको पूरी तरह रोकना तो सम्भव नहीं है किंतु कुछ प्राकृतिक उपायों से इनकी गति को मंद किया जा सकता है और इनके प्रभाव को कम किया जा सकता है।
कम सुनाई देना वृद्ध लोगों में एक आम शिकायत है। अधेडावस्था के बाद लगभग सभी व्यक्तियों को यह शिकायत हो जाती है। इसको निम्न उपायों से बहुत हद तक ठीक किया जा सकता है-
1. सफ़ाई - प्रति सप्ताह कानों की सफ़ाई किसी तीली पर रुई लगाकर करनी चाहिए। तीली अधिक भीतर तक डालना उचित नहीं है। केवल कान के छेद की दीवारों की सफाई मुलायम हाथ से कर लेनी चाहिए।
2. तेल डालना - सप्ताह में एक बार साधारण सरसों का तेल हल्का गर्म करके दो बूँद डालकर कान की हल्की मालिश बाहर से और कान के पीछे करनी चाहिए।
3. प्राणायाम - श्रवणशक्ति बढ़ाने के लिए कर्णशक्ति विकासक प्राणायाम बहुत उपयोगी है। इसकी विधि यह है कि मुँह में खूब हवा भरकर नाक को दोनों अँगूठों से दबाकर सिर को ज़रा सा झुकाकर कानों से हवा निकालने के लिए ज़ोर लगाना चाहिए। हवा नहीं निकलेगी लेकिन ज़ोर लगाने से कानों पर पर्याप्त दबाव पड़ेगा। यह क्रिया रोज़ तीन से पांच बार करना पर्याप्त है। इसके आलावा भ्रामरी प्राणायाम भी इसमें बहुत उपयोगी होता है. वह भी 5 बार अवश्य करना चाहिए.
4. यदि श्रवणशक्ति बहुत अधिक क्षीण हो गयी है तो कानों की एक दवा इसप्रकार तैयार करें- काले तिलों का तेल लगभग १०० मिली लीटर लीजिए। एक लहसुन को छीलकर कलियों को उस तेल में डाल दीजिए। इसको तब तक गर्म कीजिए या उबालिए जब तक लहसुन की कलियाँ काली न हो जायें। अब इस तेल को उतारकर ठंडा कर लीजिए और छानकर किसी शीशी में भर लीजिए। रोज़ सोते समय इसकी दो दो बूँद गुनगुना करके दोनों कानों में डालकर हल्की मालिश करके रुई लगा लीजिए। इससे कानों को बहुत लाभ होता है।
5. अगर शंख बजा सकें तो रोज़ दो तीन बार बजाइए।
अगर किसी के कान पूरी तरह ख़राब नहीं हुए हैं तो उसकी श्रवणशक्ति इन उपायों से बहुत हद तक वापस आ जाएगी, इसकी गारंटी है।
पुनश्च, ये उपाय सभी के लिए उपयोगी हैं, केवल वृद्धों के लिए ही नहीं।
-- विजय कुमार सिंघल
वैशाख कृ ८, सं. २०७३ वि.

गुर्दे तथा मूत्र रोगों का प्रमुख कारण

मेरे पास चिकित्सा परामर्श के लिए जो मामले आते हैं उनमें बड़ी संख्या ऐसे मामलों की है जिनका संबंध गुर्दों और मूत्राशय की बीमारियों से होता है, जैसे गुर्दे या मूत्राशय में पथरी, पेशाब नली में रुकावट या सूजन, पेशाब सही न आना, दर्द या संक्रमण होना, मूत्रांग में जलन होना, मूत्र में पस या खून आना आदि आदि। मेरी जानकारी में ऐसे लोगों को भी ये शिकायतें हुई हैं जिनका आहार विहार सात्विक है और जिन्हें कोई व्यसन भी नहीं है।
जब मैंने इनके कारणों पर विचार किया तो मेरी समझ में आया कि इन शिकायतों का मुख्य कारण तीन ग़लतियाँ हैं जो हम लोग जाने-अनजाने करते रहते हैं। इन ग़लतियों का कुप्रभाव जल्दी नज़र नहीं आता, परंतु होता जरूर है। मैं यहाँ इन ग़लतियों की चर्चा करना चाहता हूँ।
पहली ग़लती जो हम लोग करते हैं वह है पानी कम पीना। लोग प्राय: पानी पीना भूल जाते हैं और बहुत प्यास लगने पर ही पानी पीते हैं। कई लोग जानबूझकर पानी इसलिए कम पीते हैं कि उन्हें टॉयलेट न जाना पड़े। यह बहुत बड़ी ग़लती है जिसका कुपरिणाम आगे चलकर भुगतना पड़ता है।
टॉयलेट जाने में शर्माने का कोई कारण नहीं है। जितनी बार पानी पीते हैं उतनी बार टॉयलेट जाना पड़े तो भी उचित है। इसलिए हमें जाड़ों में प्रतिदिन कम से कम तीन लीटर और गर्मियों में चार लीटर पानी अवश्य पी लेना चाहिए। शीतल पेय, चाय आदि पानी का विकल्प नहीं हैं। इनसे हमारे गुर्दों पर बोझ बहुत बढ़ जाता है।
दूसरी ग़लती जो हम लोग करते हैं वह है मूत्र के वेग को रोकना। यदि आसपास टॉयलेट न हो तो कुछ समय तक इसे रोकने का कारण समझ में आता है परंतु सामान्य स्थिति में पेशाब रोकने का कोई कारण नहीं है। आयुर्वेद में कहा गया है कि मल, मूत्र, छींक, जँभाई आदि तेरह प्रकार के वेगों को कभी रोकना नहीं चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। मूत्र के वेग को रोकने पर मूत्राशय पर बहुत दबाव पड़ता है और गुर्दों का कार्य भी बाधित होता है। इसलिए ऐसी ग़लती कभी नहीं करनी चाहिए।
तीसरी ग़लती जो अधिकांश लोग करते हैं वह है मूत्र विसर्जन करते समय ज़ोर लगाना। लोग अपना समय बचाने के लिए ऐसा करते हैं परंतु इसके बदले में उन्हें कई गुना समय उन रोगों को देना पड़ता है जो इसके कारण उत्पन्न हो जाते हैं। पेशाब नली में सूजन आना, जलन होना, पथरी बन जाना, मूत्र में पस आना आदि इन्हीं कारणों से होता है। इसलिए भूलकर भी मूत्र विसर्जन करते समय बिल्कुल ज़ोर मत लगाइए और मूत्र को अपने आप निकलने दीजिए, भले ही इसमें एक मिनट अधिक लग जाये।
यदि आप इन तीनों ग़लतियों से बचे रहेंगे तो गुर्दे और मूत्राशय की ही नहीं, बल्कि और भी बहुत सी बीमारियों से बचे रहेंगे। इतना ही नहीं, यदि ये बीमारियाँ हो गयी हों तो इन ग़लतियों को सुधारकर उनसे सरलता से छुटकारा भी पा सकेंगे।
विजय कुमार सिंघल
वैशाख कृ. १५, सं. २०७३ वि.

सर्वाइकल स्पोंडिलाइटिस का उपचार

इसमें कंधों के आसपास दर्द उठता है और कई बार सिर को इधर-उधर घुमाना भी कष्टदायक हो जाता है। यह कोई रोग नहीं है बल्कि ग्रीवा के जोड़ों में विकार आ जाने के कारण ऐसा होता है। गलत तरीके से उठने-बैठने तथा कम्प्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल आदि पर सिर के बजाय पीठ झुकाकर काम करने से यह समस्या उत्पन्न होती है। इसलिए इसमें कोई दवा काम नहीं करती। केवल उचित व्यायाम और सही तरीके से उठना बैठना ही इसका उपचार है।
निम्नलिखित व्यायामों को दिन में 4-5 बार नियमित रूप से करने पर स्पोंडिलाइटिस और सर्वाइकल का कष्ट केवल 5-7 दिन में अवश्य ही समाप्त हो जाता है।
ग्रीवा- (1) गर्दन को धीरे-धीरे बायीं ओर जितना हो सके उतना ले जाइए। गर्दन में थोड़ा तनाव आना चाहिए। इस स्थिति में 2-3 सेकेंड रुक कर वापस सामने ले आइए। अब गर्दन को दायीं ओर जितना हो सके उतना ले जाइए और फिर 2-3 सेकेंड रुक कर वापस लाइए। यही क्रिया 8-8 बार कीजिए। यह क्रिया करते समय कंधे बिल्कुल नहीं घूमने चाहिए। (2) यही क्रिया ऊपर और नीचे 8-8 बार कीजिए। (3) यही क्रिया अगल-बगल 8-8 बार कीजिए। इसमें गर्दन घूमेगी नहीं, केवल बायें या दायें झुकेगी। गर्दन को बगल में झुकाते हुए कानों को कंधे से छुआने का प्रयास कीजिए। अभ्यास के बाद इसमें सफलता मिलेगी। तब तक जितना हो सके उतना झुकाइए। (4) गर्दन को झुकाए रखकर चारों ओर घुमाइए- 8 बार सीधे और 8 बार उल्टे। अन्त में, एक-दो मिनट गर्दन की चारों ओर हल्के-हल्के मालिश कीजिए।
कंधों के विशेष व्यायाम- (1) वज्रासन में बैठ जाइए। दोनों हाथों को कोहनियों से मोड़कर सारी उँगलियों को मिलाकर कंधों पर रख लीजिए। अब हाथों को गोलाई में धीरे-धीरे घुमाइए। ऐसा 10 बार कीजिए। (2) यही क्रिया हाथों को उल्टा घुमाते हुए 10 बार कीजिए। (3) वज्रासन में ही हाथों को दायें-बायें तान लीजिए और कोहनियों से मोड़कर उँगलियों को मिलाकर कंधों पर रख लीजिए। कोहनी तक हाथ दायें-बायें उठे और तने रहेंगे। अब सिर को सामने की ओर सीधा रखते हुए केवल धड़ को दायें बायें पेंडुलम की तरह झुलाइए। ऐसा 20 से 25 बार तक कीजिए।
यह तीसरा व्यायाम सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। हमारी रीढ़ के ऊपरी सिरे पर यानी गरदन के पास 5 मुख्य जोड़ हैं और निचले सिरे पर यानी कमर के पास 3 मुख्य जोड़ होते हैं। इस व्यायाम से ये सभी 8 जोड़ ढीले हो जाते हैं। इस व्यायाम को ठीक से समझने के लिए संलग्न वीडियो देखिए।
सर्वाइकल स्पोंडिलाइटिस से बचने के लिए अपनी रीढ की हड्डी को हमेशा सीधा रखना चाहिए, चाहे बैठे हों, खड़े हों, लेटे हों या चल रहे हों
विजय कुमार सिंघल
वैशाख कृ. ११, सं. २०७३ वि.
https://www.facebook.com/vijay.k.singhal.5/videos/1193449300678888/
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दैनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम

यहाँ मैं ऐसा कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसका पालन हर व्यक्ति हर जगह और हर मौसम में कर सकता है और सदा स्वस्थ बना रह सकता है। यदि किसी व्यक्ति को साधारण स्वास्थ्य सम्बंधी समस्यायें हों तो वे भी इससे दूर हो जाएँगी। लेकिन यदि किसी को कोई विशेष रोग है तो कुछ परिवर्तन या परिवर्द्धन करना पड़ सकता है।
योग-व्यायाम
* प्रातः काल 6 बजे उठते ही एक गिलास गुनगुने पानी में आधा नीबू का रस और एक चम्मच शहद घोलकर पियें। फिर 5 मिनट बाद शौच जायें।
* यदि पेट ठीक से साफ न हुआ हो तो शौच के बाद 3 मिनट तक पेड़ू (नाभि से नीचे का पेट का आधा भाग) पर खूब ठंडे पानी में तौलिया गीली करके पोंछा लगायें।
* मौसम सहन करने योग्य हो तो टहलने जायें। तेज़ चाल से कम से कम डेढ़-दो किमी टहलें।
* टहलने के बाद कहीं पार्क में या घर पर नीचे दी गयी क्रियाएं करें।
- पवन मुक्तासन 1-2 मिनट
- भुजंगासन 1-2 मिनट
- रीढ़ के व्यायाम
- नेत्र, मुख और ग्रीवा व्यायाम
- उंगली, कलाई, कोहनी और कंधों के व्यायाम
- भस्त्रिका प्राणायाम प्रतिदिन 5 चक्र
- कपालभाति प्राणायाम प्रतिदिन 300 बार
- अनुलोम विलोम प्राणायाम प्रतिदिन 5 मिनट
- अग्निसार क्रिया 3 बार
- भ्रामरी 3 बार
- उद्गीत (ओंकार ध्वनि) 3 बार
- तितली व्यायाम 1 मिनट
भोजन
* व्यायाम के बाद खाली पेट लहसुन की तीन-चार कली छीलकर छोटे-छोटे टुकड़े करके सादा पानी से निगल लें या चबायें।
* नाश्ता प्रातः 8 बजे - अंकुरित अन्न या दलिया या एक पाव मौसमी फल और एक कप गाय का दूध या छाछ।
* दोपहर भोजन 1 से 2 बजे- रोटी, सब्जी, सलाद, दही, इच्छानुसार दाल चावल भी ले सकते हैं।
* दोपहर बाद 4 बजे - किसी मौसमी फल का एक गिलास जूस या नीबू-पानी-शहद
* रात्रि भोजन 8 से 8.30 बजे - दही छोड़कर दोपहर जैसा। भूख से थोड़ा कम खायें।
* परहेज- चाय, काफी, कोल्ड ड्रिंक, अंडा, मांस, मछली, शराब, सिगरेट, तम्बाकू बिल्कुल नहीं। बिस्कुट, मिठाई, फास्ट फूड, नमकीन कभी-कभी कम मात्रा में ले सकते हैं।
* यदि चाय पूरी तरह न छोड़ सकें, तो दिन में केवल दो बार आधा-आधा कप लें या इसकी जगह ग्रीन टी लिया करें।
* फ्रिज का पानी न पियें। नमक कम से कम लें।
* दिन में कम से कम तीन या साढ़े तीन लीटर सादा पानी पियें। हर एक़ या सवा घंटे पर एक गिलास। जितनी बार पानी पीयेंगे उतनी बार पेशाब आयेगा। उसे रोकना नहीं है।
* भोजन के बाद पानी न पियें। केवल कुल्ला कर लें। उसके एक घंटे बाद एक गिलास गुनगुना पानी पियें।
* रात्रि 10-10.30 बजे सोते समय एक चम्मच त्रिफला चूर्ण गुनगुने पानी के साथ लें।
विशेष
* सभी तरह की दवायें बिल्कुल बंद रखें।
* नहाने के साबुन का प्रयोग बंद कर दें। गीली तौलिया से रगड़कर नहायें।
* सिर को मुल्तानी मिट्टी से सप्ताह में दो बार धोयें। सिर में केवल शुद्ध नारियल का तेल डालें।
विजय कुमार सिंघल
वैशाख कृ. ३, सं. २०७३ वि.