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Wednesday, 22 May 2013

मध्यकालीन इतिहास की धुँधली तस्वीर


किसी गौरवशाली देश का इतिहास भी गौरवशाली होता है। यदि उस देश की नयी पीढ़ी को उस गौरव का बोध कराने की आवश्यकता है, तो उसे उसके इतिहास का ज्ञान कराना चाहिए। प्राचीन काल में इतिहास का ज्ञान प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति को कराया जाता था। आज भी इतिहास एक प्रमुख विषय के रूप में स्कूली विद्यार्थियों को पढ़ाया जाता है। लेकिन खेद इस बात का है कि हमने अपने गौरवशाली इतिहास को इस प्रकार विकृत कर दिया है कि उसकी असली तस्वीर धुँधली हो गयी है और नकली तस्वीर चमक रही है।

भारतीय इतिहास के साथ इस खिलवाड़ के मुख्य दोषी वे वामपंथी इतिहासकार हैं, जिन्होंने स्वतंत्रता के बाद नेहरू की सहमति से प्राचीन हिन्दू गौरव को उजागिर करने वाले इतिहास को या तो काला कर दिया या धुँधला कर दिया और इस गौरव को कम करने वाले इतिहास-खंडों को प्रमुखता से प्रचारित किया, जो उनकी तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के खाँचे में फिट बैठते थे। ये तथाकथित इतिहासकार अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की उपज थे, जिन्होंने नूरुल हसन और इरफान हबीब की अगुआई में इस प्रकार इतिहास को विकृत किया।

इनकी एकांगी इतिहास दृष्टि इतनी अधिक मूर्खतापूर्ण थी कि वे आज तक महावीर, बुद्ध, अशोक, चन्द्रगुप्त, चाणक्य आदि के काल का सही-सही निर्धारण नहीं कर सके हैं। इसीकारण लगभग 1500 वर्षों का लम्बा कालखंड अंधकारपूर्ण काल कहा जाता है, क्योंकि इस अवधि में वास्तव में क्या हुआ और देश का इतिहास क्या था, उसका कोई पुष्ट प्रमाण कम से कम सरकारी इतिहासकारों के पास उपलब्ध नहीं है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि अलाउद्दीन खिलजी और बख्तियार खिलजी ने अपनी धर्मांधता के कारण दोनों प्रमुख पुस्तकालय जला डाले थे। लेकिन बिडम्बना तो यह है कि भारत के इतिहास के बारे में जो अन्य देशीय संदर्भ एकत्र हो सकते थे, उनको भी एकत्र करने का ईमानदार प्रयास नहीं किया गया। इसकारण मध्यकालीन भारत का पूरा इतिहास अभी भी उपलब्ध नहीं है।

भारतीय इतिहास कांग्रेस पर लम्बे समय तक इनका कब्जा रहा, जिसके कारण इनके द्वारा लिखा या गढ़ा गया अधूरा और भ्रामक इतिहास ही आधिकारिक तौर पर भारत की नयी पीढ़ी को पढ़ाया जाता रहा। वे देश के नौनिहालों को यह झूठा ज्ञान दिलाने में सफल रहे कि भारत का सारा इतिहास केवल पराजयों और गुलामी का इतिहास है और यह कि भारत का सबसे अच्छा समय केवल तब था जब देश पर मुगल बादशाहों का शासन था। तथ्यों को तोड़-मरोड़कर ही नहीं नये ‘तथ्यों’ को गढ़कर भी वे यह सिद्ध करना चाहते थे कि भारत में जो भी गौरवशाली है वह मुगल बादशाहों द्वारा दिया गया है और उनके विरुद्ध संघर्ष करने वाले महाराणा प्रताप, शिवाजी आदि पथभ्रष्ट थे।

अब जबकि भारतीय इतिहास कांग्रेस से इनका एकाधिकार समाप्त हो गया है और छिपाये हुए ऐतिहासिक तथ्य सामने आ रहे हैं, यह स्पष्ट होता जा रहा है कि भारत का मध्यकालीन इतिहास कुछ अपवादों को छोड़कर प्राचीन इतिहास की तरह ही गौरवशाली था और जिसे तथाकथित गुलामी का काल कहा जाता है, वह स्वतंत्रता के लिए निरन्तर संघर्ष का काल था।

मैं भारतीय इतिहास के साथ किये गये इस खिलवाड़ को सामने लाने के लिए कुछ विशेष घटनाक्रमों का विवेचन क्रमशः करूँगा, ताकि इतिहास पर पड़ी हुई धूल की पर्तें कुछ साफ हों।

‘एक’ का महत्व


भारतीय संस्कृति में ऐसी हजारों पुरानी परम्परायें हैं, जो ऊपर से देखने में व्यर्थ और मामूली लगती हैं, लेकिन गहराई से विचार करने पर हमें उनका मर्म और उनकी वैज्ञानिकता समझ में आती है। यह सम्भव है कि हमारे अज्ञान के कारण और काल के प्रभाव से उन परम्पराओं में कुछ विकृतियाँ आ गयी हों, फिर भी हमें उन विकृतियों से दूर रहकर उनका पालन करना चाहिए और उन परम्पराओं की वैज्ञानिकता का लाभ उठाना चाहिए।      

ऐसी ही एक परम्परा है- दान की राशि में एक रुपया जोड़कर देने की। जब कोई व्यक्ति किसी धार्मिक या सामाजिक कार्य में कोई धनराशि दान करता है या किसी मांगलिक अवसर पर कुछ भेंट करता है, तो परम्परा के रूप में यह राशि 21 रु, 51 रु, 101 रु, 501 रु, 1001 रु. के रूप में होती है। अर्थात् एक निश्चित बड़ी राशि में ‘एक’ जुड़ा होता है। कई लोग इस ‘एक’ को जोड़ना व्यर्थ मानते हैं और सीधे 20 रु., 50 रु., 100 रु., 500 रु, 1000 रु या इससे भी अधिक की राशि दे देते हैं। लेकिन सूक्ष्मता से विचार करने पर हम पाते हैं कि दान की बड़ी राशि में ‘एक’ अलग से जोड़ना तो हमारी बहुत ही श्रेष्ठ परम्परा है।

इस परम्परा के दो अर्थ हैं। पहला अर्थ यह है कि किसी राशि में ‘एक रुपया’ जोड़कर देने वाला व्यक्ति इस प्रकार से यह घोषणा करता है कि उसके लिए एक रुपया भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितनी कि शेष राशि। इसलिए इस राशि के प्रत्येक अंश का सदुपयोग ही किया जाना चाहिए।

इस परम्परा का दूसरा अर्थ यह है कि इसमें एक रुपया भेंटकर्ता की श्रद्धा का प्रतीक है और शेष राशि उसकी सामथ्र्य का द्योतक है। विभिन्न व्यक्तियों की सामथ्र्य उनकी आर्थिक स्थिति के अनुसार अलग-अलग हो सकती है, परन्तु सबकी श्रद्धा बराबर होती है। इसी समानता की घोषणा के लिए प्रत्येक राशि के साथ ‘एक रुपया’ अलग से जोड़ा जाता है। इसलिए दान या भेंट की राशि में श्रद्धा का प्रतीक ‘एक’ जुड़ा होना आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति ऐसा नहीं करता, तो उसका अर्थ यह निकलता है कि उसके द्वारा दिया जाने वाला दान या भेंट की जाने वाली राशि श्रद्धा से रहित है और उसकी आर्थिक सामथ्र्य का प्रदर्शन मात्र है, जो अहंकार को बढ़ाने वाला है।

इन दोनों अर्थों को ध्यान में रखते हुए हमें दान या भेंट की राशि में ‘एक’ जोड़ने की परम्परा का पालन अवश्य करना चाहिए। वैसे यह परम्परा घाते की प्रथा से आयी है। जैसे दूध नापने वाला अन्त में थोड़ा सा दूध और डाल देता है या अनाज तौलने वाला थोड़ा सा अनाज और डाल देता है, इसी तरह दान या भेंट देने वाला सभी कमी-वेशी को पूरा करने के लिए राशि में ‘एक’ जोड़ देता है। यह भारतीय संस्कृति की महानता है कि इस मामूली बात के द्वारा इतना बड़ा सन्देश दिया गया है।

पैगम्बर और भगवान्


एक बार अकबर ने बीरबल से पूछाः "तुम्हारे भगवान और हमारे खुदा में बहुत फर्क है। हमारा खुदा तो अपना पैगम्बर भेजता है जबकि तुम्हारा भगवान बार-बार आता है। यह क्या बात है ?"

बीरबलः "जहाँपनाह ! इस बात का कभी व्यवहारिक तौर पर अनुभव करवा दूँगा। आप जरा थोड़े दिनों की मोहलत दीजिए।"

चार-पाँच दिन बीत गये। बीरबल ने एक आयोजन किया। अकबर को यमुनाजी में नौका-विहार कराने ले गये। कुछ नावों की व्यवस्था पहले से ही करवा दी थी। उस समय यमुनाजी छिछली न थीं। उनमें अथाह जल था। बीरबल ने एक युक्ति की कि जिस नाव में अकबर बैठा था, उसी नाव में एक दासी को अकबर के नवजात शिशु के साथ बैठा दिया गया। सचमुच में वह नवजात शिशु नहीं था। मोम का बालक पुतला बनाकर उसे राजसी वस्त्र पहनाये गये थे ताकि वह अकबर का बेटा लगे। दासी को सब कुछ सिखा दिया गया था।

नाव जब बीच मझधार में पहुँची और हिलने लगी तब 'अरे.... रे... रे.... ओ.... ओ.....' कहकर दासी ने स्त्री चरित्र करके बच्चे को पानी में गिरा दिया और रोने बिलखने लगी। अपने बालक को बचाने-खोजने के लिए अकबर धड़ाम से यमुना में कूद पड़ा। खूब इधर-उधर गोते मारकर, बड़ी मुश्किल से उसने बच्चे को पानी में से निकाला। वह बच्चा तो क्या था मोम का पुतला था।

अकबर कहने लगाः "बीरबल ! यह सारी शरारत तुम्हारी है। तुमने मेरी बेइज्जती करवाने के लिए ही ऐसा किया।"

बीरबलः "जहाँपनाह ! आपकी बेइज्जती के लिए नहीं, बल्कि आपके प्रश्न का उत्तर देने के लिए ऐसा ही किया गया था। आप इसे अपना शिशु समझकर नदी में कूद पड़े। उस समय आपको पता तो था ही इन सब नावों में कई तैराक बैठे थे, नाविक भी बैठे थे और हम भी तो थे ! आपने हमको आदेश क्यों नहीं दिया ? हम कूदकर आपके बेटे की रक्षा करते !"

अकबरः "बीरबल ! यदि अपना बेटा डूबता हो तो अपने मंत्रियों को या तैराकों को कहने की फुरसत कहाँ रहती है? खुद ही कूदा जाता है।"

बीरबलः "जैसे अपने बेटे की रक्षा के लिए आप खुद कूद पड़े, ऐसे ही हमारे भगवान जब अपने बालकों को संसार एवं संसार की मुसीबतों में डूबता हुआ देखते हैं तो वे पैगम्बर-वैगम्बर को नहीं भेजते, वरन् खुद ही प्रगट होते हैं। वे अपने बेटों की रक्षा के लिए आप ही अवतार ग्रहण करते है और संसार को आनंद तथा प्रेम के प्रसाद से धन्य करते हैं। आपके उस दिन के सवाल का यही जवाब है.

Sunday, 19 May 2013

अंधविश्वास, विज्ञान व हिंदु धर्म


(यह लेख मेरे एक मित्र श्री बाल कृष्ण करनाणी जी का लिखा हुआ है. वे भी एक ब्लॉगर हैं. श्री करनाणी जी के अनुरोध पर मैं इस लेख को अपने ब्लॉग पर डाल रहा हूँ, हालाँकि इसकी हर बात से मेरा सहमत होना आवश्यक नहीं है.)


आजकल विज्ञान की हर बात पर आंख बंद कर विश्वास किया जाता है, हालांकि इसने हमें कुछ भौतिक सुविधाओं के अलावा केवल बीमारी व प्रदूषण ही दिया है। इसी प्रकार हमारे प्राचीन वैज्ञानिक (ऋषि-मुनि) कुछ कहते हैं, कम्पनियां (ब्राह्मण व ढोंगी साधु-संत) उसका अलग अर्थ निकाल कर लूट रहे हैं। विज्ञान की परमाणु शक्ति का दुरुपयोग बम आदि में किया जाता है। इस प्रकार विज्ञान कई वस्तुओं का मना करते हैं जैसे अलमुनियम के बर्तन, रिफाइंड तेल, आम नहाने के साबुन, फिर भी कम्पनियां बेचकर लूट मचा रही हैं। जब आधुनिक युग में थोड़े से समय मे इतना अंधविश्वास फैल गया, तो क्या भारत के लाखों साल पुराने समाज में विश्वास नहीं फैलेगा?

हिंदू धर्म के रीति-रिवाज, परम्पंराओं व कर्म-कांड का धर्म से कोई सम्बंध नहीं था। ये सब स्वास्थ्य के लिए थे, जिन्हें धर्म व दिनचर्या से जोड़ दिया गया और जनता को गहरा विश्वास हो गया। इसका उस समय कि कंम्पनियों (साधु व पंडित) ने विभिन्न प्रकार से फायदा उठाया। उसी लूट का फल है अंधविश्वास। आज इनके गुण न देख कर अंधविरोध होने लगा। मुझे कुछ परम्पराओं कि थोड़ी जानकारी है, लिख रहा हूँ।

तिलक से पता लगता है कि 24 घंटे जीवन है कि नहिं। अगर तिलक जो कुंकुंम (हल्दी, चूना व नीबू का बना) व चावल लगाने पर नहिं सूखता, तो समझो जीवन केवल 5-6 घंटे का रह गया है।

जनेऊ को मल-मूत्र करते समय कान पर लपेटने से गुर्दे व आँत के रोग काबू में रहते हैं। आज जनेऊ के बहाने ब्राह्मण भोज कर कुरीति चला रखी है।

सूर्य को अर्घ देने से नेत्र ज्योति बढ़ती है व क्षय रोग ठीक होता है। यह करने का सही समय वह है जब अंधविश्वास, विज्ञान व हिंदु धर्म सूर्य लाल रंग में हो व नाभि पर किरणें पड़नी चाहिए। यह केवल 15 मिनट का समय होता है, परन्तु लोग 12 बजे तक अर्घ देते हैं। ताँबे के बर्तन में पानी रात का हो। उसकी धार में से देखें व श्वास खींचें, इससे कापरआक्साईड मिलता है, जो क्षय रोग के स्ट्रेप्टोमाइसिन टीके का आधार है।

रजस्वला के समय पूर्ण विश्राम की आवश्यकता होती है। पहले बड़ों के सामने छोटे नहीं बैठते थे। फिर सास के सामने बहू का बैठना बिलकुल असंभव। इस समय विकृत किरणें निकलती हैं, जिसके कारण सामने वाले अपने को असहज महसूस करते हैं। कभी-कभी तो पौधों की पत्तियां सिकुड़ जाती हैं। अब इसका पता कैसे लगे? हर जगह जानकार नहीं मिलते, तब अछूत का रास्ता निकाला गया। माहवारी से 7 दिन तक सहवास करने से होने वाली संतान अपंग व बीमार रहती है।

कर्ण छेदन को आजकल श्रृंगार में ले रखा है, जबकि इसे प्रथम माहवारी के समय ऊपर की तरफ से करते हैं, जो एक्युपंचर के नियम पर होना चाहिये। इससे गर्भाशय के रोग नियंत्रण में रहते हैं। गहने ऐक्युप्रैसर के नियम से बनते थे। अंगूठे के पास की अंगुली रक्त व प्रदर का नियंत्रण करती है। उसके पास वाली कम रक्त आता है तो चालु करती है। इसी प्रकार पाजेब पैर का दर्द रोकती है। सभी गहने शरीर के प्रमाप को देख कर उसी के अनुसार बनाये जाते थे। ज्यादा भारी होने पर शीशा आदि मिलाया जाता था।

अब आवश्यकता है कि योग की तरह ही अन्य भारतीय रीति-रिवाजों के रहस्य पता किये जायें।

-- बाल कृष्ण करनाणी

Monday, 13 May 2013

पाकिस्तान में नवाज शरीफ की ताजपोशी


यों तो पाकिस्तान के आम चुनाव उनका अन्दरूनी मामला है, लेकिन पड़ोसी होने के नाते वहाँ की प्रमुख राजनैतिक घटनाओं का प्रभाव भारत पर पड़ना अवश्यम्भावी है. पाकिस्तान में संपन्न हुए इन चुनावों की कई विशेषताएं रहीं-

१. कई कट्टरपंथी ताकतों और आतंकवादी संगठनों ने इन चुनावों को गैर इस्लामी बताते हुए घोर विरोध किया. एक राज्य में तो महिलाओं को भी मतदान नहीं करने दिया गया. फिर भी लगभग ६०% मतदान हुआ, जितना आज तक कभी हुआ था. यह एक अच्छा लक्षण है और इस बात की पहचान है की अब पाकिस्तान की जनता भी लोकतंत्र का महत्त्व समझ गयी है.

२. चुनाव प्रचार में कई जगह हिंसा हुई, जिनमें ५० से अधिक लोगों की जान गयी, लेकिन फिर भी उम्मीदवारों और पार्टियों ने चुनाव प्रचार बंद नहीं किया. इसका अर्थ है कि वे अपनी जान हथेली पर रखकर भी पाकिस्तान में लोकतंत्र की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना चाहते हैं. इसका परिणाम यह हुआ कि मतदान लगभग शान्तिपूर्ण निबट गया.

३. इन चुनावों में धांधली की शिकायतें नहीं आयीं, इससे पता चलता है कि वहाँ के चुनाव आयोग ने अपनी जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा से निभाया. मीडिया ने भी अपना दायित्व बखूबी निभाया. यह भविष्य के लिए बहुत शुभ लक्षण है.

४. नवाज शरीफ की पार्टी लगभग पूरे बहुमत के साथ सत्ता में आई. मैं अपने लेख "लाहौर से कारगिल तक" (लिंक देखिये- http://khattha-meetha.blogspot.in/2013/01/blog-post_5687.html  ) में लिख चुका हूँ कि "यदि पाकिस्तान के किसी नेता पर विश्वास किया जा सकता है तो वे केवल नवाज शरीफ हैं।" यह प्रसन्नता की बात ही कही जायेगी कि वे ही नवाज शरीफ फिर से पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री के रूप में सत्ता में आ रहे हैं. वे भारत के साथ अपने देश के मधुर सम्बन्धों का महत्त्व जानते हैं और चुनाव प्रचार में भी उन्होंने इस बात को बार-बार दोहराया था. पाकिस्तान की जनता ने उनको बहुमत देकर यह सिद्ध किया है कि वह भी भारत के साथ मधुर सम्बन्ध बनाये रखना चाहती है, क्योंकि उसके देश की प्रगति के लिए यही एकमात्र रास्ता है.

५. इन चुनावों ने यह सिद्ध कर दिया है कि भले ही पाकिस्तान में कट्टरपंथी और आतंकवादी अशांति फैलाते रहते हैं, लेकिन उनको आम जनता का समर्थन नहीं है और इस्लाम के नाम पर यह आतंकवाद अब आगे अधिक लम्बा नहीं खिंच सकता, भले ही पाकिस्तान की सेना उनको खाद-पानी देती रहे.

६. नवाज शरीफ ने यह संकेत दिया है कि वे अपने शासन में सेना पर लगाम लगाकर रखेंगे. यह एक अच्छी नीति है. अगर ऐसा होता है तो भारत यह उम्मीद कर सकता है कि अब कम से कम कश्मीर के मामले में सेना अपनी करतूतों से बाज आयेगी.

इतने शुभ लक्षणों के होते हुए भी भारत को पूरी तरह सावधान रहने की आवश्यकता है, क्योंकि कट्टरपंथी तत्व, आतंकवादी संगठन और सेना यों आसानी से पाकिस्तान में लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत नहीं होने देंगे और देर-सवेर खुराफातें जरुर करेंगे.

अभी तो हम नवाज शरीफ और उनके देश पाकिस्तान को अपनी शुभकामनायें ही दे सकते हैं.

दरियादिली या नालायिकी?

आज के "अमर उजाला" में एक समाचार है जिसने मेरा ध्यान आकर्षित किया है. संक्षेप में समाचार इस प्रकार है-

विगत २५ अप्रैल को राहुल गाँधी भोपाल हवाई अड्डे जा रहे थे. वहां उनको एक अखबार बेचने वाला लड़का मिला, जिसने उनसे अख़बार खरीदने का आग्रह किया. राहुल गाँधी ने अख़बार ले लिया और उसको एक हज़ार का नोट दिया. लड़के ने वह नोट यह कहकर वापस कर दिया कि उसके पास १००० के छुट्टे नहीं हैं. फिर वह अख़बार की कीमत लिये बिना चला गया. वह लड़का कक्षा ५ में पढ़ता है और डाक्टर बनना चाहता है. इस पर कांग्रेसी नेताओं को उस लड़के पर दया आई और उन्होंने लड़के को गोद लेना तय किया है तथा उस लड़के को हर माह १००० रुपये दिए जायेंगे.

यदि यह समाचार सत्य है तो इस पर कई प्रश्न उठते हैं-

१. राहुल गाँधी की जेब में केवल १-१ हज़ार के नोट क्यों रखे हुए थे? उनसे वे क्या खरीदना चाहते थे? क्या वे अपने साथ १०-१० के कुछ नोट नहीं ले जा सकते? हज़ार के नोट वे किसको दिखाना चाहते हैं?

२. अगर राहुल के पास छोटे नोट नहीं थे, तो क्या उनके साथ चलने वाले दूसरे लोगों के पास भी नहीं थे? क्या सभी इतने रईस हैं कि हज़ार से नीचे के नोट लेकर नहीं चलते?

३. राहुल गाँधी को क्या इतना भी पता नहीं कि एक अख़बार केवल ३ या ४ रुपये का आता है? अगर उनको इतना भी मालूम नहीं तो वे किस आधार पर आम जनता की पार्टी होने का दावा करते हैं?

४. क्या राहुल गाँधी इतने बड़े मूर्ख हैं जो यह भी नहीं समझ सकते कि एक मामूली अख़बार बेचने वाले लड़के के पास हज़ार के नोट के छुट्टे नहीं हो सकते? क्या इतना बड़ा मूर्ख प्रधान मंत्री के पद के लायक है?

५. कांग्रेस ने उस लड़के को हर महीने हज़ार रुपये देने का वायदा किया है. मैं नहीं मानता कि कभी ऐसा होगा, क्योंकि कांग्रेस के सारे वायदे झूठे ही होते हैं. लेकिन अगर यह वायदा सही मान लिया जाये, तो इसे कांग्रेस कि दरियादिली कहेंगे या मूर्खता, जो एक मेहनती लड़के को मुफ्तखोरी की आदत डालना चाहती है? क्या इससे अच्छा यह न होता कि वे उसकी स्कूल फीस देने कि व्यवस्था कर देते और उसके पिता को कहीं ऐसा काम दिला देते कि उस लड़के को अख़बार न बेचने पड़ें?

वारणावत का षड्यंत्र


दुर्योधन ने पांडवों को अपने रास्ते से हटाने के लिए अनेक षड्यंत्र किये थे। उनमें से वारणावत का षड्यत्र सबसे भीषण था। इसमें उसने न केवल सभी पांडवों बल्कि उनकी माता कुन्ती को भी जीवित जलाकर मार डालने का उपाय किया था। इस भयंकर षड्यंत्र से वे विदुर जी की सूझ-बूझ से ही निकल पाये थे।

पांडव अपनी शिक्षा पूर्ण कर चुके थे और युवराज के रूप में उनमें से सबसे वरिष्ठ युधिष्ठिर का नाम भी घोषित किया जा चुका था। यह लगभग निश्चित था कि समय आने पर उनका भारत के सम्राट के रूप में राजतिलक होगा और कौरव केवल साधारण राजकुमार बनकर रहेंगे। यही बात दुर्योधन सहन नहीं कर सकता था, इसलिए उसने पांडवों को उनकी माता सहित मार डालने का षड्यंत्र रचा। इस षड्यंत्र में उसका मामा शकुनि पूर्ण भागीदार था और कर्ण भी। दुयोधन का अंधा बाप धृतराष्ट्र उसकी मुट्ठी में था, इसलिए वह वही करता था, जो दुर्योधन चाहता था।

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में वारणावत नामका एक स्थान है, जो मेरठ से लगभग 42 किमी है। वहाँ महाभारत के समय में वार्षिक समारोह या मेला आयोजित किया जाता था, जिसमें कुरु सम्राट शामिल होते थे। उस वर्ष दुर्योधन ने अपने पिता को समझाया कि इस बार युवराज युधिष्ठिर को वहाँ भेजा जाय, ताकि वहाँ की जनता भी अपने युवराज को देख ले। अंधा राजा फौरन इसके लिए तैयार हो गया और उसने आदेश निकाल दिया कि सभी पांडव अपनी माता के साथ इस समारोह में जायेंगे।

दुर्योधन ने उनके रहने के लिए एक ऐसा भवन बनाया, जिसकी दीवारें अत्यन्त ज्वलनशील पदार्थों से बनी हुई थीं। उसने अपने एक विश्वस्त आदमी विरोचन को उस भवन के निर्माण की देखरेख करने के बहाने वहाँ नियुक्त कर दिया और उसी को आग लगाने की जिम्मेदारी भी सौंप दी। जब विदुर को पता लगा कि सभी पांडवों और माता कुन्ती को भी इस समारोह में भेजा जा रहा है, तो उनका माथा ठनका। उन्होने अपने गुप्तचरों को भेजकर पता लगा लिया कि भवन ज्वलनशील पदार्थों से बनाया गया है और सभी को जलाकर मार डालने की योजना है। वे खुलकर राजा के आदेश का विरोध नहीं कर सकते थे, इसलिए उन्होंने पांडवों के बचाव का प्रबंध कर दिया।

सबसे पहले तो उन्होंने गुप्त शब्दों में युधिष्ठिर को इस षड्यंत्र के प्रति सतर्क कर दिया। उन्होंने कूट शब्दों में युधिष्ठिर से कहा- ‘जंगल की अग्नि सभी जानवरों को जलाकर भस्म कर देती है, लेकिन बिलों में रहने वाले जन्तु उस आग से अपनी रक्षा कर लेते हैं।’ इन शब्दों का उपयोग गुप्त संकेत के रूप में किया गया था, जैसे कि आजकल कम्प्यूटर में पासवर्ड होते हैं। युधिष्ठिर बहुत बुद्धिमान थे। वे जानते थे कि चाचा विदुर कभी कोई निरर्थक बात नहीं कहते। इससे वे समझ गये कि चाचा ने उनको आग से सावधान रहने और बचने का उपाय करने के लिए कहा है। महाभारत में इस प्रसंग के समय यह उल्लेख है कि विदुर और युधिष्ठिर ने एक गुप्त भाषा ‘मधुरा’ में बात की थी, ताकि कोई तीसरा व्यक्ति उस बातचीत को न समझ सके।

इतना ही नहीं विदुर जी ने एक सुरंग खोदने वाला भी उनके पास भेज दिया। उसने गुप्त संकेत बताकर अपनी विश्वसनीयता सिद्ध की और फिर दिन-रात मेहनत करके इतनी लम्बी सुरंग खोद दी कि वे भवन से बाहर निकलकर जंगल में जा सकें। इसी के साथ ही पांडवों ने उन दिनों आस-पास के जंगलों को शिकार के बहाने छान मारा ताकि बाहर सुरक्षित निकलने का मार्ग देख सकें और भटककर कौरवों के हाथ न पड़ जायें।

जब सुरंग तैयार हो गयी, तो पांडवों ने जिस दिन विरोचन को महल में आग लगानी थी, उससे एक दिन पहले ही एक महिला को उसके 5 पुत्रों के साथ भोजन पर बुलाया और उनको नशे में धुत करके भीतर ही सुला दिया। फिर विरोचन के कमरे का दरवाजा बाहर से बन्द कर दिया और स्वयं महल में आग लगाकर सुरंग के रास्ते बाहर निकल गये। महल वास्तव में बहुत ज्वलनशील था, इसलिए शीघ्र ही पूरा आग की लपटों में समा गया। विरोचन भी जलकर मर गया, उसे अपना बचाव करने का भी मौका नहीं मिला।

जलते महल से बाहर निकलकर पांडव रात ही रात में जंगल को पार करके पूर्व की दिशा में गंगा के किनारे पहुँच गये। गंगा नदी के पार राक्षसों का क्षेत्र था, जहाँ जाना खतरे से खाली नहीं था, लेकिन गंगा के पार न जाने पर कौरवों को उनका पता चल जाता और वे आसानी ने पांडवों की हत्या कर देते। इसलिए उन्होंने गंगा को पार करके राक्षसों के क्षेत्र में जाना ही उचित समझा। विदेर जी ने एक नाव का प्रबंध कर रखा था, जिसमें बैठकर वे प्रातः होने से पहले ही गंगा के पार पहुँच गये।

इधर हस्तिनापुर में जब पांडवों के जलकर मरने का समाचार पहुँचा, तो दिखावे के लिए कौरवों ने बहुत आँसू बहाये, लेकिन मन ही मन खुश भी हुए कि पांडु का पूरा वंश समाप्त हो गया।  विरोचन भी जलकर मर गया था, यह जानकर दुर्योधन का माथा ठनका था, लेकिन प्रकट में उसने कुछ नहीं किया। जले हुए भवन में 5 पुरुषों और एक महिला की लाश जली हुई मिली थी, इसलिए सबने यह मान लिया कि पाँचों पांडव अपनी माता कुंती सहित जल मरे। वैसे दुर्योधन ने अपने गुप्तचर छोड़े भी थे, लेकिन वे पांडवों का कोई सुराग नहीं पा सके, क्योंकि पांडव तो राक्षसों के क्षेत्र में थे, जहाँ तक गुप्तचर नहीं पहुँच सकते थे।