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Sunday, 22 May 2016

नभाटा ब्लॉग पर मेरे दो वर्ष - 8

नभाटा में अपने ब्लॉग पर लेख लिखते हुए उन पर आने वाली टिप्पणियों से मुझे पता चलता था कि अधिकांश लोगों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में बहुत सतही जानकारी है और कई बार तो वह भी गलत है. इसलिए मैंने संघ के बारे में लेखों की एक श्रृंखला लिखना तय किया. इन लेखों को अच्छा प्रत्युत्तर मिला. इनमें से कुछ का लिंक दे रहा हूँ.
संघ निर्माता डा. केशव बलीराम हेडगेवार
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/…/%E0%A4%B…
संघ की स्थापना: क्यों और कैसे
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/…/%E0%A4%B…
द्वितीय सरसंघचालक परमपूज्य श्री गुरुजी
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/…/%E0%A4%A…
संघ विचार परिवार
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/…/%E0%A4%B…
संघ की शाखा में क्या होता है?
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/…/%E0%A4%B…
इन सभी लेखों पर बड़ी संख्या में टिप्पणियाँ आई थीं, जिनमें से अधिकांश समर्थन में थीं और कुछ विरोध में भी थीं जिनका मैंने उचित उत्तर दिया.
मैंने संघ के बारे में बहुत से भ्रमों का निराकरण करने का प्रयास किया था. जिसमें में सफल रहा.
वैसे बीच बीच में मैं अन्य सामयिक और सामाजिक विषयों पर भी लिखता रहता था.
विजय कुमार सिंघल
वैशाख शुक्ल 9, सं. 2073 वि.

एसिडिटी की प्राकृतिक चिकित्सा

उपचार
* प्रातः काल 5:30 या 6 बजे उठते ही एक गिलास सादा पानी में आधा नीबू का रस और एक चम्मच शहद घोलकर पियें। फिर 5 मिनट बाद शौच जायें।
* शौच के बाद 5-10 मिनट तक ठंडा कटिस्नान लें, फिर टहलने जायें। तेज़ चाल से कम से कम डेढ़-दो किमी टहलें।
* टहलने के बाद कहीं पार्क में या घर पर नीचे दी गयी क्रियाएं करें।
- पवन मुक्तासन 1-2 मिनट
- भुजंगासन 1-2 मिनट
- रीढ़ के व्यायाम
- नेत्र, मुख और ग्रीवा व्यायाम
- उंगली, कलाई, कोहनी, कंधों के व्यायाम
- कपालभाति प्राणायाम 300 बार
- अनुलोम विलोम प्राणायाम 5 मिनट
- अग्निसार क्रिया 3 बार
- भ्रामरी 3 बार
- उद्गीत (ओंकार ध्वनि) 3 बार
- तितली व्यायाम एक मिनट
* व्यायाम के बाद खाली पेट लहसुन की तीन-चार कली छीलकर छोटे-छोटे टुकड़े करके सादा पानी से निगल लें या चबायें।
* रात्रि 10-10.30 बजे सोते समय एक चम्मच त्रिफला चूर्ण सादे पानी के साथ लें या एक चम्मच शहद में मिलाकर चाटें।
भोजन
* नाश्ता प्रातः 8 बजे - अंकुरित अन्न या दलिया या एक पाव मौसमी फल और एक कप गाय का बिना मक्खन का दूध या छाछ।
* दोपहर भोजन 1 से 2 बजे- रोटी, सब्जी, सलाद, दही (दाल चावल कभी-कभी कम मात्रा में)
* दोपहर बाद 4 बजे - किसी मौसमी फल का एक गिलास जूस या नीबू-पानी-शहद
* रात्रि भोजन 8 से 8.30 बजे - दही छोड़कर दोपहर जैसा। भूख से थोड़ा कम खायें।
* परहेज- चाय, काफी, कोल्ड ड्रिंक, बिस्कुट, मिर्च, खटाई, मिठाई, फास्ट फूड, अंडा, मांस, मछली, शराब, सिगरेट, तम्बाकू बिल्कुल नहीं।
* सभी तरह की गर्म चीज़ों से बचें। सब्ज़ी भी ठंडी करके खायें।
* फ्रिज का पानी न पियें। मटकी या सुराही का साधारण शीतल जल पियें।
* सब्ज़ी में मसाले तथा नमक कम से कम डालें।
* दिन भर में साढ़े तीन या चार लीटर सादा पानी पियें। हर एक़ या सवा घंटे पर एक गिलास। जितनी बार पानी पीयेंगे उतनी बार पेशाब आयेगा। उसे रोकना नहीं है।
* भोजन के बाद पानी न पियें। केवल कुल्ला कर लें। उसके एक घंटे बाद एक गिलास सादा पानी पियें।
विशेष
* सभी तरह की दवायें बिल्कुल बंद रखें।
* नहाने के साबुन का प्रयोग बंद कर दें। गीली तौलिया से रगड़कर नहायें।
* यदि कभी उल्टी आये, तो कर दें और अगर केवल बेचैनी हो तो आधा कप ठंडा सादा दूध घूँट घूँट करके पियें।
* एक माह बाद अपना हाल बतायें। बीच में कोई समस्या होने पर तत्काल बतायें।
विजय कुमार सिंघल
वैशाख शु. १२, सं. २०७३ वि.

अंकुरित अन्न

कई प्राकृतिक चिकित्सक इसे ‘अमृतान्न’ कहते हैं। हम इसे भोजन का अंग ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भोजन भी बना सकते हैं। यदि यह सम्भव न हो, तो इसे नाश्ते के रूप में सेवन करना बहुत अच्छा रहेगा। यह पकाये हुए अन्न से अधिक लाभदायक होता है और पचने में अत्यन्त हलका होता है।
अन्न को अंकुरित करने की विधि बहुत सरल है। साबुत अनाजों जैसे चना, गेहूँ, मूँग, उड़द, मैथी दाने आदि को आवश्यक मात्रा में लेकर साफ कर लें और एक दो बार साफ पानी में धो लें। अब इनको किसी कटोरे में रखकर पानी में भिगो दें। 10-12 घंटे भिगोये रखने के बाद उनको किसी कपड़े में लपेटकर उसी कटोरे में रख दें और पानी निकाल दें। कटोरे को अच्छी तरह ढक दें।
ऐसा करने से 24 घंटों या अधिक से अधिक 48 घंटों में उनमें अंकुर निकल आयेंगे। उनको एक बार और धोकर खायें। चाहें तो थोड़ा सैंधा नमक और नीबू भी डाल सकते हैं। स्वाद बढ़ाने के लिए आप उसमें धनिया, टमाटर, प्याज, अदरक और हरी मिर्च के टुकड़े और रातभर भिगोये हुए मूँगफली के दाने मिला सकते हैं।
अंकुरित अन्न खाने से हमारे शरीर के लिए आवश्यक सभी विटामिनों और खनिज पदार्थों की पूर्ति हो जाती है। यह पाचन प्रणाली को सुधारने के लिए भी बहुत लाभदायक है, क्योंकि इन्हें पचाने में शरीर को अधिक श्रम नहीं करना पड़ता। इसके विपरीत आग पर पकाये हुए अन्न को पचाने में आँतों पर बहुत दबाव पड़ता है।
आप चाहें तो पूर्णतः कच्चा खाने अर्थात् आग के सम्पर्क में न आयी हुई वस्तुओं को ही ग्रहण करने का व्रत ले सकते हैं। इसे अपक्वाहार कहा जाता है। अपक्वाहार पुराने और हठी रोगों से मुक्ति प्राप्त करने में बहुत कारगर सिद्ध हुआ है। यदि हम अपने आहार में अन्न और फलों का पर्याप्त अनुपात बनाये रखें और मूँगफली के दानों के रूप में चिकनाई भी लेते रहें, तो अपक्वाहार से किसी भी प्रकार की हानि होने की कोई सम्भावना नहीं है।
-- विजय कुमार सिंघल
वैशाख शु. ११, सं. २०७३ वि.

Sunday, 15 May 2016

नभाटा ब्लॉग पर मेरे दो वर्ष - 8

नभाटा में अपने ब्लॉग पर लेख लिखते हुए उन पर आने वाली टिप्पणियों से मुझे पता चलता था कि अधिकांश लोगों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में बहुत सतही जानकारी है और कई बार तो वह भी गलत है. इसलिए मैंने संघ के बारे में लेखों की एक श्रृंखला लिखना तय किया. इन लेखों को अच्छा प्रत्युत्तर मिला. इनमें से कुछ का लिंक दे रहा हूँ.
संघ निर्माता डा. केशव बलीराम हेडगेवार
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/…/%E0%A4%B…
संघ की स्थापना: क्यों और कैसे
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/…/%E0%A4%B…
द्वितीय सरसंघचालक परमपूज्य श्री गुरुजी
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/…/%E0%A4%A…
संघ विचार परिवार
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संघ की शाखा में क्या होता है?
http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/…/%E0%A4%B…
इन सभी लेखों पर बड़ी संख्या में टिप्पणियाँ आई थीं, जिनमें से अधिकांश समर्थन में थीं और कुछ विरोध में भी थीं जिनका मैंने उचित उत्तर दिया.
मैंने संघ के बारे में बहुत से भ्रमों का निराकरण करने का प्रयास किया था. जिसमें में सफल रहा.
वैसे बीच बीच में मैं अन्य सामयिक और सामाजिक विषयों पर भी लिखता रहता था.
विजय कुमार सिंघल
वैशाख शुक्ल 9, सं. 2073 वि.

Thursday, 12 May 2016

नाभि टलने का सरल उपचार

कई बार किसी किसी की नाभि अपनी जगह से हट जाती है जिसे नाभि टलना कहते हैं। जब वह ऊपर की ओर टलती है तो कब्ज, पेट दर्द, बेचैनी आदि होती है और जब वह नीचे की ओर टलती है तो पेट दर्द के साथ दस्त हो जाते हैं। इन दोनों का एक ही सरल उपचार है जिससे मिनटों में बिना किसी दवा के नाभि को सही स्थान पर बैठाया जा सकता है।
सबसे पहले रोगी को ज़मीन पर कोई दरी या चादर बिछाकर पेट के बल लिटा दीजिए। उसके हाथों को सामने इस तरह रखवाइए कि उस पर सिर सीधा टिक जाये और नाक ज़मीन से न टकराये। अब रोगी के बग़ल में इस तरह खड़े हो जाइये कि उसके पैर आपके दायें हाथ ओर रहें।
अब अपना बायाँ पैर रोगी की कमर पर रखिए और ंदायें हाथ से उसका एक पैर उठाइए। पैर से रोगी की कमर को दबाये रखकरश रोगी के पैर को पीछे की ओर दबाइए। पैर लम्बा रखना चाहिए। ऐसा दो तीन बार कीजिए। इसी तरह दूसरे पैर को उठाकर पीछे दबाइए। अंत में दोनों पैरों को एक साथ उठाकर पीछे की ओर दबाइए।
अब रोगी को चित लिटा दीजिए। ऐसा करने से थोडी देर में ही नाभि अपने सही स्थान पर आ जाएगी।
यदि आपकी अपनी नाभि टल गयी है तो भुजंगासन और धनुरासन बारी बारी से कीजिए।
नाभि टलने की पहचान
इससे या तो बहुत तेज़ पतले दस्त होते हैं या पेट में बहुत भयंकर दर्द अचानक होने लगता है। अगर गैस नहीं है तो अवश्य ही नाभि टल गयी होती है।
नाभि के ऊपर अगर हम हाथ का अंगूठा हल्का दबा कर देखेगें तो हमे धडकन के धडकने जैसा महसूस होगा। मगर नाभि टलने पर ये महसूस नही होगा। एवं नाभि जिस तरफ जगह छोडकर गयी है उस जगह पर वही धडकन के जैसा महसूस होगा।
ये भी नाभि टलने का पता लगाने का एक तरीक़ा है।
विजय कुमार सिंघल
वैशाख शु. ५, सं २०७३ वि

टहलना

यह सर्वोत्तम व्यायाम है। यह हर उम्र के व्यक्तियों द्वारा हर जगह किया जा सकता है और इसका कोई कुप्रभाव भी कभी दृष्टिगोचर नहीं होता। यदि यह नियमित किया जाये तो लाभ ही लाभ मिलता है और यदि कभी-कभी छूट जाये तो भी हानि नहीं होती।
प्रातःकाल का समय टहलने के लिए सर्वोत्तम है, क्योंकि उस समय हवा में आक्सीजन सबसे अधिक होती है, वातावरण शुद्ध और आनन्ददायक होता है और शान्ति भी होती है। सूर्योदय से एक घंटा पहले से लेकर एक घंटा बाद तक का समय टहलने के लिए सर्वश्रेष्ठ है। यदि किसी कारणवश प्रातःकाल न टहल सकते हों, तो सायंकाल सूर्यास्त के समय पर टहला जा सकता है।
टहलना प्रायः हर मौसम में किया जा सकता है, लेकिन यदि अत्यधिक ठंड हो, बारिश हो रही हो, कोहरा हो, तेज हवा या आँधी चल रही हो या अन्य कोई कारण हो, तो टहलने के लिए न निकलना ही अच्छा है। इसके स्थान पर उस दिन जाॅगिंग (एक ही स्थान पर खड़े-खड़े दौड़ना) अथवा अंग व्यायाम कर लेने चाहिए, जिनके बारे में अन्यत्र बताया गया है।
टहलने के लिए कोई पार्क या नदी का किनारा हो, तो बेहतर है। यदि यह उपलब्ध न हो, तो ऐसी चौड़ी सड़कों पर भी टहला जा सकता है, जहाँ पेड़ हों और टैम्पो, मोटरगाड़ियों आदि का प्रदूषण न हो।
टहलते समय कपड़े मौसम के अनुकूल, परन्तु ढीले और हलके होने चाहिए। पैरों में रबड़ की चप्पलें हों तो बेहतर, जाड़ों में कपड़े के जूते पहनकर भी टहला जा सकता है। भारी जूते पहनकर टहलना उचित नहीं। टहलते समय शरीर सीधा रहना चाहिए और चाल तेज होनी चाहिए, जैसे कहीं जाने की जल्दी हो। गहरी साँसें लेना बहुत लाभदायक रहता है।
टहलते समय आप प्राणायाम भी कर सकते हैं। इससे टहलने का लाभ कई गुना बढ़ जाता है। इसकी विधि यह है कि चार कदम चलने तक साँस भरनी चाहिए और फिर छः कदम चलने तक साँस निकालनी चाहिए। इस प्रकार लयपूर्वक साँस लेते रहने से प्राणायाम होता रहता है। इस गिनती को आप अपनी सुविधा और क्षमता के अनुसार कम या अधिक कर सकते हैं। मूल बात यह है कि साँस लेने और छोड़ने में एक लय होनी चाहिए। टहलते समय साँस को कभी-भी रोकना नहीं चाहिए।
टहलना प्रतिदिन एक किलोमीटर से प्रारम्भ करना चाहिए और प्रति सप्ताह आधा किलोमीटर बढ़ाते हुए अपनी शक्ति और सुविधा के अनुसार तीन से पाँच किलोमीटर तक प्रतिदिन टहलना चाहिए।
विजय कुमार सिंघल
वैशाख कृ १२, सं २०७३ वि.

वृद्धावस्था में सुनने की समस्या का समाधान

बढ़ती उम्र के साथ हमारे शरीर के सभी अंग एक सीमा के बाद शिथिल हो जाते हैं। हाथ पैर काँपना, दिखाई कम देना, सुनाई कम देना, वाणी लड़खड़ा जाना, पाचन शक्ति मंद हो जाना, कमर झुक जाना, झुर्रियां पड़ना आदि कुछ अनिवार्य लक्षण हैं जो कम या अधिक मात्रा में प्रत्येक व्यक्ति में उत्पन्न हो जाते हैं। इनको पूरी तरह रोकना तो सम्भव नहीं है किंतु कुछ प्राकृतिक उपायों से इनकी गति को मंद किया जा सकता है और इनके प्रभाव को कम किया जा सकता है।
कम सुनाई देना वृद्ध लोगों में एक आम शिकायत है। अधेडावस्था के बाद लगभग सभी व्यक्तियों को यह शिकायत हो जाती है। इसको निम्न उपायों से बहुत हद तक ठीक किया जा सकता है-
1. सफ़ाई - प्रति सप्ताह कानों की सफ़ाई किसी तीली पर रुई लगाकर करनी चाहिए। तीली अधिक भीतर तक डालना उचित नहीं है। केवल कान के छेद की दीवारों की सफाई मुलायम हाथ से कर लेनी चाहिए।
2. तेल डालना - सप्ताह में एक बार साधारण सरसों का तेल हल्का गर्म करके दो बूँद डालकर कान की हल्की मालिश बाहर से और कान के पीछे करनी चाहिए।
3. प्राणायाम - श्रवणशक्ति बढ़ाने के लिए कर्णशक्ति विकासक प्राणायाम बहुत उपयोगी है। इसकी विधि यह है कि मुँह में खूब हवा भरकर नाक को दोनों अँगूठों से दबाकर सिर को ज़रा सा झुकाकर कानों से हवा निकालने के लिए ज़ोर लगाना चाहिए। हवा नहीं निकलेगी लेकिन ज़ोर लगाने से कानों पर पर्याप्त दबाव पड़ेगा। यह क्रिया रोज़ तीन से पांच बार करना पर्याप्त है। इसके आलावा भ्रामरी प्राणायाम भी इसमें बहुत उपयोगी होता है. वह भी 5 बार अवश्य करना चाहिए.
4. यदि श्रवणशक्ति बहुत अधिक क्षीण हो गयी है तो कानों की एक दवा इसप्रकार तैयार करें- काले तिलों का तेल लगभग १०० मिली लीटर लीजिए। एक लहसुन को छीलकर कलियों को उस तेल में डाल दीजिए। इसको तब तक गर्म कीजिए या उबालिए जब तक लहसुन की कलियाँ काली न हो जायें। अब इस तेल को उतारकर ठंडा कर लीजिए और छानकर किसी शीशी में भर लीजिए। रोज़ सोते समय इसकी दो दो बूँद गुनगुना करके दोनों कानों में डालकर हल्की मालिश करके रुई लगा लीजिए। इससे कानों को बहुत लाभ होता है।
5. अगर शंख बजा सकें तो रोज़ दो तीन बार बजाइए।
अगर किसी के कान पूरी तरह ख़राब नहीं हुए हैं तो उसकी श्रवणशक्ति इन उपायों से बहुत हद तक वापस आ जाएगी, इसकी गारंटी है।
पुनश्च, ये उपाय सभी के लिए उपयोगी हैं, केवल वृद्धों के लिए ही नहीं।
-- विजय कुमार सिंघल
वैशाख कृ ८, सं. २०७३ वि.