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Monday, 21 January 2013

नेहरू का पाप, तिब्बत के आँसू


अपने लेख ‘नेहरू की मूर्खता की चरमसीमा: पंचशील’ में मैं लिख चुका हूँ कि नेहरू ने चीन के धूर्त और झूठे नेताओं की चिकनी चुपड़ी बातों में आकर 1954 में पंचशील समझौता कर लिया था। इस समझौते का भारत को तो कोई लाभ कभी नहीं मिला, लेकिन चीन ने अपनी विस्तारवादी नीति को सफल करने में इसका पूरा लाभ उठाया। जैसा कि मैं पहले भी लिख चुका हूँ, चीन दुनिया का सबसे कमीना देश है और इसके नेताओं का एक शब्द भी विश्वास करने लायक नहीं है। लेकिन नेहरू इस बात को नहीं समझते थे या नहीं मानते थे, जबकि देश के सभी प्रमुख नेताओं जैसे डा. अम्बेडकर, डा. राजेन्द्र प्रसाद, डा. लोहिया और गुरुजी तक ने उनको बार-बार चेतावनी दी थी।

वास्तव में 1949 में चीन में लाल क्रांति हुई थी और माओ ने सत्ता हथिया ली थी, जो यह मानते थे कि सत्ता बन्दूक की नली से निकलती है। नेहरू पहले ही रूस क्रांति के कारण कम्यूनिस्टों से प्रभावित थे, चीन की क्रांति के बाद तो वे और भी अभिभूत हो गये और यह नहीं मानते थे कि कम्यूनिस्ट भी कभी कोई गलत कार्य कर सकते हैं। नेहरू के मंत्रिमंडल में भी कई छद्म कम्यूनिस्ट शामिल थे, जो उन्हें लाल पट्टी पढ़ाते रहते थे और राष्ट्रवादियों के विरुद्ध भड़काते रहते थे।

विस्तारवादी चीन तिब्बत ही नहीं, सिक्किम, भूटान, नेपाल, लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश तक को अपना भाग मानता है, इस बात को कभी छिपाता भी नहीं है। पंचशील समझौता होते ही सबसे पहले उसने तिब्बत पर अपनी नजरें गढ़ायीं। वहाँ उसने कुछ तिब्बतियों को उकसाकर विद्रोही गतिविधियाँ पहले से ही चलवा रखीं थीं। तिब्बत ने बुद्ध की अहिंसा के कारण अपनी कोई सेना नहीं बनायी थी। इसके अलावा माओ ने धौंस देकर तिब्बत पर एक 17-सूत्री समझौता थोप दिया। इसका पूरा फायदा चीन ने उठाया और तिब्बत में थोड़ी सी भी अराजकता होने पर अपनी सेनायें भेजकर वहाँ के शासक दलाई लामा को घेर लिया।

दलाई लामा ने जब अपना शासन और जीवन खतरे में देखा, तो भारत में शरण लेने का विचार करने लगे। किसी प्रकार वे सिक्किम में आये और वहाँ नेहरू से मुलाकात की। उन्होंने अपनी सारी कहानी नेहरू को सुनाई, लेकिन नेहरू तो ‘हिन्दी-चीनी भाई-भाई’ के नशे में डूबे हुए थे। उन्होंने दलाई लामा से स्पष्ट कह दिया कि भारत आपकी सहायता नहीं कर सकता और आपको वापस जाकर 17-सूत्री अनुबंध के अनुसार कार्य करने का प्रयास करना चाहिए। इस सबकी मार्मिक कहानी परम पावन दलाई लामा ने अपनी आत्मकथा में लिखी है, जिसका हिन्दी अनुवाद ‘मेरा देश निकाला’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। यह पुस्तक तिब्बत की भयावह त्रासदी हमारे सामने प्रस्तुत करती है।

नेहरू से निराश होकर दलाई लामा अनिच्छापूर्वक फिर तिब्बत लौट गये और स्थिति सँभालने की कोशिश करने लगे। लेकिन हालात धीरे-धीरे बिगड़ते गये और दलाई लामा को सदा के लिए तिब्बत छोड़ने को बाध्य होना पड़ा। किसी तरह वे चीनी सैनिकों की नजरों से बचकर रात के अँधेरे में अपने कुछ अनुयायियों के साथ भारत आने में सफल रहे। यहाँ आकर मसूरी में उन्होंने फिर नेहरू से भेंट की और सारी घटनायें बतायीं। उन्होंने यह भी कहा कि हम निर्वासन में ही तिब्बत सरकार का गठन करना चाहते हैं। इस पर नेहरू ने उनको बच्चों की तरह डाँटते हुए कहा कि हम आपकी सरकार को मान्यता नहीं दे सकते। तथाकथित शान्ति-दूत नेहरू का यह क्रूर रूप देखकर दलाई लामा हतप्रभ रह गये।

सीधे-साधे तिब्बत को चीनी भेड़ियों के आगे फेंक देने का जो महा पाप नेहरू ने किया था, उसका कुपरिणाम शीघ्र ही भारत को भी भुगतना पड़ा और 1962 में चीन ने पंचशील समझौते की धज्जियाँ उड़ाते हुए भारत पर आक्रमण कर दिया और हमारी हजारों वर्ग किमी भूमि अपने कब्जे में कर ली। इसके बाद ही नेहरू की आँखें खुलीं, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। तिब्बत आज भी खून के आँसू रो रहा है और चीन की विस्तारवादी नीति आज भी जारी है। नेहरू के पाप का फल हम आज भी भुगत रहे हैं।

धर्म चर्चा


‘सभी धर्म समान हैं!’
वाह! क्या बात कही है! धर्म हैं तो समान होंगे ही। कोई धर्म किसी दूसरे धर्म से छोटा-बड़ा कैसे हो सकता है। लेकिन क्या अधर्म भी धर्मों के समान होता है? पहले यह तो तय हो कि हम जिनकी समानता की बात कर रहे हैं वे धर्म हैं भी कि नहीं। इस बात की क्या कसौटी है कि किसे धर्म माना जाये और किसे नहीं?

‘सभी धर्म ईश्वर की ओर ले जाते हैं।’
बिल्कुल ठीक! ले जाने ही चाहिए। लेकिन अगर कोई तथाकथित धर्म ईश्वर की ओर नहीं ले जाता, बल्कि किसी शैतान की ओर ले जाता हो, तो क्या तब भी उसे धर्म माना जायेगा?

‘हमें सभी धर्मों का आदर करना चाहिए।’
अवश्य करना चाहिए! अगर सभी धर्म समान हैं और सभी ईश्वर की ओर ले जाते हैं, तो हमें उनका आदर करना ही चाहिए। लेकिन क्या हमें अधर्म का आदर भी करना चाहिए? पहले यह तो तय कर लो कि कोई तथाकथित धर्म हमारे आदर का पात्र है भी या नहीं अर्थात् वह वास्तव में धर्म है या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं है कि वह अधर्म हो और धर्मों के बीच में घुसकर हमारा आदर पाना चाहता हो?

धर्म के बारे में इस तरह तमाम अच्छी-अच्छी बातें की जाती हैं, लेकिन कोई नहीं जानता कि धर्म वास्तव में है क्या और कैसे किसी विचारधारा या परम्परा को धर्म और किसी समुदाय को धार्मिक समुदाय कहा जा सकता है। क्या सभी तरह के समुदाय, जो एक विशेष विचारधारा से जुड़े हों, को धार्मिक समुदाय कहा जा सकता है और उस विचारधारा को धर्म की मान्यता दी जा सकती है?

मान लीजिए एक अनपढ़, आवारा, पियक्कड़ आदमी है। वह अपने जैसे दस-बीस आवारा लड़कों का गिरोह बना लेता है और उनको अपने प्रति वफादार रहने की कसम खिला देता है। वह गिरोह रेगिस्तान या जंगल से जाने वाले काफिलों को लूट लेता है। उसके पुरुषों को मार देता है, महिलाओं को अपने भोग का सामान बना लेता है और बच्चों को गुलाम बना लेता है, जो बाद में बड़े होकर उसी के गिरोह में शामिल हो जाते हैं। इसी तरह उसका गिरोह बढ़ता जाता है और उसकी ताकत बढ़ जाती है। वे किसी काल्पनिक ईश्वर या खुदा को दिन में 10 बार याद करने का अनिवार्य नियम भी बना लेते हैं। अब सवाल उठता है कि क्या इस गिरोह को धार्मिक समुदाय माना जाएगा? आखिर वह कसौटी कौन सी है, जिसके अनुसार इस गिरोह को धर्म माना जा सकता है? उदाहरण के लिए, यदि गब्बर सिंह अपने गिरोह को धार्मिक समुदाय मानने की माँग करे, तो क्या उसे ऐसी मान्यता दी जायेगी?

हमारे प्राचीन ग्रन्थों में धर्म की बड़ी गहरी व्याख्या की गयी है। रामचरित मानस में ‘धर्म न दूसर सत्य समाना’, ‘परम धरम श्रुति विदित अहिंसा’ और ‘परहित सरिस धरमु नहिं भाई’ कहकर सत्य, अहिंसा ओर परोपकार को सबसे बड़ा धर्म बताया है। इसका अर्थ है कि ये तीनों गुण किसी भी धर्म के आवश्यक अंग होने चाहिए। वैदिक ऋषियों ने कहा है कि धर्म के 10 लक्षण या गुण हैं, जो किसी व्यक्ति में होने पर ही उसे धार्मिक कहा जा सकता है। ये लक्षण हैं-
धृति क्षमा दमो अस्तेयं शौचं इन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम्।।

अर्थात् धैर्य, क्षमा (या दया), वासनाओं का दमन, चोरी न करना, आन्तरिक और बाह्य पवित्रता, इन्द्रियों पर नियंत्रण, बुद्धि, ज्ञान, सत्य भाषण-आचरण और क्रोध न करना ये धर्म के दस लक्षण या पहचान हैं। इन लक्षणों में कहीं भी किसी पूजा-पद्धति या ईश्वर आराधना का स्थान नहीं है। वास्तव में पूजा-पद्धतियाँ धर्म नहीं हैं, यहाँ तक कि वे धर्म की अंग भी नहीं हैं, बल्कि धर्म के गुणों को विकसित करने का और अवगुणों से दूर रहने का साधन मात्र हैं। इसलिए धार्मिक व्यक्ति में पूजा-पद्धति के नाम पर किसी भी तरह की कट्टरता होनी ही नहीं चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति अपनी रुचि के अनुसार अपने इष्ट प्रभु से सम्बंध बनाने और उसे अपनी पद्धति से याद करने या न करने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए।

यदि हम इस कसौटी पर आज के तथाकथित धर्मों को कसें, तो कई ‘धर्म’ वास्तव में अधर्म सिद्ध होंगे। जिस तथाकथित धर्म की बुनियाद ही हिंसा पर टिकी है, वह धर्म कैसे हो सकता है, वह तो अधर्म ही कहा जाएगा। यदि हम धर्म को ठीक से समझ लें, तो तथाकथित धर्मों के नाम पर जो बुराइयाँ अनाचार और आतंकवाद फैला हुआ है, उससे मुक्ति पायी जा सकती है।

'मैंने गाँधी को क्यों मारा?'


'मैंने गाँधी को क्यों मारा?'- नाथूराम गॉडसे का अन्तिम बयान

(इसे सुनकर अदालत में उपस्थित सभी लोगों की आँखें गीली हो गयी थीं और कई तो रोने लगे थे। एक न्यायाधीश महोदय ने अपनी टिप्पणी में लिखा था कि यदि उस समय अदालत में उपस्थित लोगों को जूरी बना दिया जाता और उनसे फैसला देने को कहा जाता, तो निस्संदेह वे प्रचण्ड बहुमत से नाथूराम के निर्दोष होने का निर्णय देते।)
एक धार्मिक ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने के कारण मैं हिन्दू धर्म, हिन्दू इतिहास और हिन्दू संस्कृति की पूजा करता हूँ। इसलिए मैं सम्पूर्ण हिन्दुत्व पर गर्व करता हूँ। जब मैं बड़ा हुआ, तो मैंने मुक्त विचार करने की प्रवृत्ति का विकास किया, जो किसी भी राजनैतिक या धार्मिक वाद की असत्य-मूलक भक्ति की बातों से मुक्त हो। यही कारण है कि मैंने अस्पृश्यता और जन्म पर आधारित जातिवाद को मिटाने के लिए सक्रिय कार्य किया। मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जातिवाद-विरोधी आन्दोलन में खुले रूप में शामिल हुआ और यह मानता हूँ कि सभी हिन्दुओं के धार्मिक और सामाजिक अधिकार समान हैं, सभी को उनकी योग्यता के अनुसार छोटा या बड़ा माना जाना चाहिए, न कि किसी विशेष जाति या व्यवसाय में जन्म लेने के कारण। मैं जातिवाद-विरोधी सहभोजों के आयोजन में सक्रिय भाग लिया करता था, जिसमें हजारों हिन्दू ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, चमार और भंगी भाग लेते थे। हमने जाति के बंधनों को तोड़ा और एक दूसरे के साथ भोजन किया।
मैंने रावण, चाणक्य, दादाभाई नौरोजी, विवेकानन्द, गोखले, तिलक के भाषणों और लेखों को पढ़ा है। साथ ही मैंने भारत और कुछ अन्य प्रमुख देशों जैसे इंग्लैंड, फ्रांस, अमेरिका और रूस के प्राचीन और आधुनिक इतिहास को भी पढ़ा है। इनके अतिरिक्त मैंने समाजवाद और माक्र्सवाद के सिद्धान्तों का भी अध्ययन किया है। लेकिन इन सबसे ऊपर मैंने वीर सावरकर और गाँधीजी के लेखों और भाषणों का भी गहरायी से अध्ययन किया है, क्योंकि मेरे विचार से किसी भी अन्य अकेली विचारधारा की तुलना में इन दो विचारधाराओं ने पिछले लगभग तीस वर्षों में भारतीय जनता के विचारों को मोड़ देने और सक्रिय करने में सबसे अधिक भूमिका निभायी है।
इस समस्त अध्ययन और चिन्तन से मेरा यह विश्वास बन गया है कि एक देशभक्त और एक विश्व नागरिक के नाते हिन्दुत्व और हिन्दुओं की सेवा करना मेरा पहला कर्तव्य है। स्वतंत्रता प्राप्त करने और लगभग 30 करोड़ हिन्दुओं के न्यायपूर्ण हितों की रक्षा करने से समस्त भारत, जो समस्त मानव जाति का पाँचवा भाग है, को स्वतः ही आजादी प्राप्त होगी और उसका कल्याण होगा। इस निश्चय के साथ ही मैंने अपना सम्पूर्ण जीवन हिन्दू संगठन की विचारधारा और कार्यक्रम में लगा देने का निर्णय किया, क्योंकि मेरा विश्वास है कि केवल इसी विधि से मेरी मातृभूमि हिन्दुस्तान की राष्ट्रीय स्वतंत्रता को प्राप्त किया और सुरक्षित रखा जा सकेगा एवं इसके साथ ही वह मानवता की सच्ची सेवा भी कर सकेगी।
सन् 1920 से अर्थात् लोकमान्य तिलक के देहान्त के पश्चात् कांग्रेस में गाँधीजी का प्रभाव पहले बढ़ा और फिर सर्वोच्च हो गया। जन जागरण के लिए उनकी गतिविधियाँ अपने आप में बेजोड़ थीं और फिर सत्य तथा अहिंसा के नारों से वे अधिक मुखर हुईं, जिनको उन्होंने देश के समक्ष आडम्बर के साथ रखा था। कोई भी बुद्धिमान या ज्ञानी व्यक्ति इन नारों पर आपत्ति नहीं उठा सकता। वास्तव में इनमें कुछ भी नया अथवा मौलिक नहीं है। वे प्रत्येक सांवैधानिक जन आन्दोलन में शामिल होते हैं। लेकिन यह केवल दिवा स्वप्न ही है यदि आप यह सोचते हैं कि मानवता का एक बड़ा भाग इन उच्च सिद्धान्तों का अपने सामान्य दैनिक जीवन में अवलम्बन लेने या व्यवहार में लाने में समर्थ है या कभी हो सकता है।
वस्तुतः सम्मान, कर्तव्य और अपने देशवासियों के प्रति प्यार कभी-कभी हमें अहिंसा के सिद्धान्त से हटने के लिए और बल का प्रयोग करने के लिए बाध्य कर सकता है। मैं कभी यह नहीं मान सकता कि किसी आक्रमण का सशस्त्र प्रतिरोध कभी गलत या अन्यायपूर्ण भी हो सकता है। प्रतिरोध करने और यदि सम्भव हो तो ऐसे शत्रु को बलपूर्वक वश में करने को मैं एक धार्मिक और नैतिक कर्तव्य मानता हूँ। (रामायण में) राम ने विराट युद्ध में रावण को मारा और सीता को मुक्त कराया, (महाभारत में) कृष्ण ने कंस को मारकर उसकी निर्दयता का अन्त किया और अर्जुन को अपने अनेक मित्रों एवं सम्बंधियों, जिनमें पूज्य भीष्म भी शामिल थे, के साथ भी लड़ना और उनको मारना पड़ा, क्योंकि वे आक्रमणकारियों का साथ दे रहे थे। यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि महात्मा गाँधी ने राम, कृष्ण और अर्जुन को हिंसा का दोषी ठहराकर मानव की सहज प्रवृत्तियों के साथ विश्वासघात किया था।
अधिक आधुनिक इतिहास में छत्रपति शिवाजी ने अपने वीरतापूर्ण संघर्ष के द्वारा ही पहले भारत में मुस्लिमों के अन्याय को रोका और फिर उनको समाप्त किया। शिवाजी द्वारा अफजल खाँ को काबू करना और उसका वध करना अत्यन्त आवश्यक था, अन्यथा उनके अपने प्राण चले जाते। इतिहास के इन विराट योद्धाओं जैसे शिवाजी, राणा प्रताप और गुरु गोविन्द सिंह की निन्दा ‘दिग्भ्रमित देशभक्त’ कहकर करने से गाँधीजी ने केवल अपनी आत्म-केन्द्रीयता को ही प्रकट किया था। वे एक दृढ़ शान्तिप्रेमी मालूम पड़ सकते हैं, लेकिन वास्तव में वे लोकविरुद्ध थे, क्योंकि वे देश में सत्य और अहिंसा के नाम पर अकथनीय दुर्भाग्य की स्थिति बना रहे थे, जबकि राणा प्रताप, शिवाजी एवं गुरु गोविन्द सिंह स्वतंत्रता दिलाने के लिए अपने देशवासियों के हृदय में सदा पूज्य रहेंगे।
उनकी 32 वर्षों तक उकसाने वाली गतिविधियों के बाद पिछले मुस्लिम-परस्त अनशन से मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचने को बाध्य हुआ था कि गाँधी के अस्तित्व को अब तत्काल मिटा देना चाहिए। गाँधी ने दक्षिण अफ्रीका में वहाँ के भारतीय समुदाय के अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए अच्छा कार्य किया, लेकिन जब वे अन्त में भारत लौटे, तो उन्होंने एक ऐसी मानसिकता विकसित कर ली जिसके अन्तर्गत अन्तिम रूप से वे अकेले ही किसी बात को सही या गलत तय करने लगे। यदि देश को उनका नेतृत्व चाहिए, तो उसको उनको सर्वदा-सही मानना पड़ेगा और यदि ऐसा न माना जाये, तो वे कांग्रेस से अलग हो जायेंगे और अपनी अलग गतिविधियाँ चलायेंगे। ऐसी प्रवृत्ति के सामने कोई भी मध्यमार्ग नहीं हो सकता। या तो कांग्रेस उनकी इच्छा के सामने आत्मसमर्पण कर दे और उनकी सनक, मनमानी, तत्वज्ञान तथा आदिम दृष्टिकोण में स्वर-में-स्वर मिलाये अथवा उनके बिना काम चलाये।
वे अकेले ही प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक वस्तु के लिए निर्णायक थे। वे नागरिक अवज्ञा आन्दोलन के पीछे प्रमुख मस्तिष्क थे, कोई अन्य उस आन्दोलन की तकनीक नहीं जान सकता था। वे अकेले ही जानते थे कि कोई आन्दोलन कब प्रारम्भ किया जाये और कब उसे वापस लिया जाये। आन्दोलन चाहे सफल हो या असफल, चाहे उससे अकथनीय आपदाएँ और राजनैतिक अपघात हों, लेकिन उससे उस महात्मा के कभी-गलत-नहीं होने के गुण पर कोई अन्तर नहीं पड़ सकता। अपने कभी-गलत-न-होने की घोषणा के लिए उनका सूत्र था- ‘सत्याग्रही कभी असफल नहीं हो सकता’ और उनके अलावा कोई नहीं जानता कि ‘सत्याग्रही’ होता क्या है। इस प्रकार महात्मा गाँधी अपने लिए जूरी और जज दोनों थे। इन बच्चों जैसे पागलपन और स्वेच्छाचारिता के साथ अति कठोर आत्मसंयम, निरन्तर कार्य और उन्नत चरित्र ने मिलकर गाँधी को भयंकर रूप से उग्र तथा निद्र्वन्द्व बना दिया था।
बहुत से लोग सोचते थे कि उनकी राजनीति विवेकहीन थी, पर या तो उन्हें कांगे्रेस को छोड़ना पड़ा या अपनी प्रतिभा को गाँधी के चरणों में डाल देना पड़ा, जिसका वे कोई भी उपयोग कर सकते थे। ऐसी पूर्ण गैरजिम्मेदारी की स्थिति में गाँधी भूल पर भूल, असफलता पर असफलता और आपदा पर आपदा पैदा करने के अपराधी थे। भारत की राष्ट्र भाषा के प्रश्न पर गाँधी की मुस्लिमपरस्त नीति उनकी हड़बड़ीपूर्ण प्रवृत्ति के अनुसार ही है। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि देश की प्रमुख भाषा बनने के लिए हिन्दी का दावा सबसे अधिक मजबूत है। अपने राजनैतिक जीवन के प्रारम्भ में गाँधीजी हिन्दी को बहुत प्रोत्साहन देते थे, लेकिन जैसे ही उनको पता चला कि मुसलमान इसे पसन्द नहीं करते, तो वे तथाकथित ‘हिन्दुस्तानी’ के पुरोधा बन गये। भारत में सभी जानते हैं कि ‘हिन्दुस्तानी’ नाम की कोई भाषा नहीं है, इसका कोई व्याकरण नहीं है और न इसकी कोई शब्दावली है। यह केवल एक बोली है, जो केवल बोली जाती है, लिखी नहीं जाती। यह हिन्दी और उर्दू की एक संकर या दोगली बोली है और महात्मा गाँधी का मिथ्यावाद भी इसे लोकप्रिय नहीं बना सकता। लेकिन केवल मुस्लिमों को प्रसन्न करने की अपनी इच्छा के अनुसार उनका आग्रह था कि केवल ‘हिन्दुस्तानी’ ही देश की राष्ट्रभाषा होनी चाहिए। हालांकि उनके अन्धभक्तों ने उनका समर्थन किया और वह तथाकथित भाषा उपयोग की जाने लगी। इस प्रकार मुस्लिमों को खुश करने के लिए हिन्दी भाषा के सौन्दर्य और शुद्धता के साथ बलात्कार किया गया। उनके सारे प्रयोग केवल हिन्दुओं की कीमत पर किये जाते थे।
अगस्त 1946 के बाद मुस्लिम लीग की निजी सेनाओं ने हिन्दुओं का सामूहिक संहार प्रारम्भ किया। तत्कालीन वायसराय लार्ड वैवेल ने इन घटनाओं से व्यथित होते हुए भी भारत सरकार कानून 1935 के अनुसार प्राप्त अपनी शक्तियों का उपयोग बलात्कार, हत्या और आगजनी को रोकने के लिए नहीं किया। बंगाल से कराची तक हिन्दुओं का खून बहता रहा, जिसका प्रतिरोध हिन्दुओं द्वारा कहीं-कहीं किया गया। सितम्बर में बनी अन्तरिम सरकार के साथ मुस्लिम लीग के सदस्यों द्वारा प्रारम्भ से ही विश्वासघात किया गया, लेकिन वे सरकार के साथ, जिसके वे अंग थे, जितने अधिक राजद्रोही और विश्वासघाती होते जाते थे, उनके प्रति गाँधी का मोह उतना ही बढ़ता चला जाता था। लार्ड वैवेल को त्यागपत्र देना पड़ा, क्योंकि वे इस समस्या को हल नहीं कर सके और उनकी जगह लार्ड माउंटबेटन आये, जैसे नागनाथ की जगह साँपनाथ आये हों। कांग्रेस ने, जो अपनी देशभक्ति और समाजवाद का दम्भ किया करती थी, गुप्त रूप से बन्दूक की नोंक पर पाकिस्तान को स्वीकार कर लिया और जिन्ना के सामने नीचता से आत्मसमर्पण कर दिया। भारत के टुकड़े कर दिये गये और 15 अगस्त 1947 के बाद देश का एक-तिहाई भाग हमारे लिए विदेशी भूमि हो गयी।
कांग्रेस में लार्ड माउंटबेटन को भारत का सबसे महान् वायसराय और गवर्नरजनरल बताया जाता है। सत्ता के हस्तांतरण की आधिकारिक तिथि 30 जून 1948 तय की गयी थी, परन्तु माउंटबेटन ने अपनी निर्दयतापूर्ण चीरफाड़ के बाद हमें 10 महीने पहले ही विभाजित भारत दे दिया। गाँधी को अपने तीस वर्षों की निर्विवाद तानाशाही के बाद यही प्राप्त हुआ और यही है जिसे कांग्रेस ‘स्वतंत्रता’ और ‘सत्ता का शान्तिपूर्ण हस्तांतरण’ कहती है। हिन्दू-मुस्लिम एकता का बुलबुला अन्ततः फूट गया और नेहरू तथा उनकी भीड़ की स्वीकृति के साथ ही एक धर्माधारित राज्य बना दिया गया। इसी को वे ‘बलिदानों द्वारा जीती गयी स्वतंत्रता’ कहते हैं। किसका बलिदान? जब कांगरेस के शीर्ष नेताओं ने गाँधी की सहमति से इस देश को काट डाला, जिसे हम पूजा की वस्तु मानते हैं, तो मेरा मस्तिष्क भयंकर क्रोध से भर गया।
गाँधी ने अपने आमरण अनशन को तोड़ने के लिए जो शर्तें रखी थीं, उनमें एक दिल्ली में हिन्दू शरणार्थियों द्वारा घेरी गयी मस्जिदों को खाली करने से सम्बंधित थी। परन्तु जब पाकिस्तान में हिन्दुओं पर हिंसक आक्रमण किये गये, तब उन्होंने उसके विरुद्ध एक शब्द भी नहीं बोला और पाकिस्तान सरकार अथवा सम्बंधित मुसलमानों को इसे रोकने के लिए कुछ नहीं किया। गाँधी इतने चतुर तो थे ही कि वे जानते थे कि यदि उन्होंने अपना आमरण अनशन तोड़ने के लिए पाकिस्तान मुसलमानों पर कोई शर्त रखी, तो उनको शायद ही कोई मुसलमान ऐसा मिलेगा जो उनकी जिन्दगी की जरा भी चिन्ता करेगा, भले ही आमरण अनशन में उनके प्राण चले जायें। इसी कारण उन्होंने अनशन तोड़ने के लिए जानबूझकर मुस्लिमों पर कोई शर्त नहीं लगायी। वे अपने अनुभव से अच्छी तरह जानते थे कि जिन्ना उनके अनशन से बिल्कुल भी विचलित या प्रभावित नहीं थे और मुस्लिम लीग गाँधी की आत्मा की आवाज का कोई मूल्य नहीं समझती।
गाँधी को ‘राष्ट्र पिता’ कहा जा रहा है। यदि ऐसा है तो वे अपने पिता जैसे कर्तव्य को निभाने में पूर्णतः असफल रहे, क्योंकि उन्होंने उसके विभाजन की स्वीकृति देकर उसके साथ विश्वासघात किया। मैं साहसपूर्वक कहता हूँ कि गाँधी अपने कर्तव्य में असफल हो गये। उन्होंने स्वयं को ‘पाकिस्तान का पिता’ होना सिद्ध किया। उनकी अन्दर की आवाज, उनकी आत्मिक शक्ति, उनका अहिंसा का सिद्धान्त, जिनसे वे बने थे, सभी जिन्ना की लौह-इच्छा के सामने चरमरा गयी और वे शक्तिहीन सिद्ध हुए। संक्षेप में, मैंने स्वयं विचार किया और समझ गया कि यदि मैं गाँधी को मार दूँगा, तो मैं पूरी तरह नष्ट हो जाऊँगा, लोगों से मुझे केवल घृणा ही मिलेगी और मैं अपना सारा सम्मान खो दूँगा, जो कि मेरे लिए जीवन से भी अधिक मूल्यवान है। लेकिन, इसके साथ ही मैंने यह भी अनुभव किया कि गाँधीजी के बिना भारत की राजनीति अधिक व्यावहारिक तथा प्रतिरोधक्षम होगी तथा सशस्त्र सेनाएँ भी अधिक बलशाली होंगी। निस्संदेह मेरा अपना भविष्य पूरी तरह खण्डहर हो जाएगा, लेकिन राष्ट्र पाकिस्तान के आक्रमणों से बच जाएगा। लोग भले ही मुझे मूर्ख या पागल कहेंगे, लेकिन राष्ट्र उस रास्ते पर बढ़ने के लिए स्वतंत्र हो जाएगा, जिसको मैं सुदृढ़ राष्ट्र-निर्माण के लिए आवश्यक समझता हूँ।
इस प्रश्न पर पूरी तरह विचार करने के बाद, मैंने इस सम्बंध में अन्तिम निर्णय कर लिया, लेकिन मैंने इस बारे में किसी से भी कोई बात नहीं की। मैंने अपने दोनो हाथों में साहस भरा और 30 जनवरी 1948 को बिरला हाउस के प्रार्थना स्थल पर गाँधीजी के ऊपर गोलियाँ दाग दीं। मैं कहता हूँ कि मेरी गोलियाँ एक ऐसे व्यक्ति पर चलायी गयी थीं, जिसकी नीतियों और कार्यों से करोड़ों हिन्दुओं को केवल बरबादी और विनाश ही मिला। ऐसी कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं थी जिसके अन्तर्गत उस अपराधी को सजा दिलायी जा सकती और इसीलिए मैंने वे घातक गोलियाँ चलायीं। मुझे व्यक्तिगत रूप से किसी भी व्यक्ति से कोई शिकायत नहीं है, लेकिन मैं कहता हूँ कि मेरे मन में इस वर्तमान सरकार के प्रति कोई सम्मान नहीं है, जिसकी नीतियाँ अन्याय की हद तक मुसलमानों के प्रति अनुकूल हैं। लेकिन इसके साथ ही मैं यह भी स्पष्ट अनुभव करता हूँ कि ये नीतियाँ पूरी तरह गाँधीजी की उपस्थिति के कारण बनी थीं।
मैं बहुत खेद के साथ कहना चाहता हूँ कि प्रधानमंत्री नेहरू भूल जाते हैं कि उनके उपदेश और कार्य कई बार एक दूसरे के प्रतिकूल होते हैं, जब इधर-उधर वे कहते हैं कि भारत एक पंथनिरपेक्ष राज्य है, क्योंकि यह ध्यान रखना आवश्यक है कि पाकिस्तान के पंथधारित देश की स्थापना में नेहरू ने प्रमुख भूमिका निभायी थी और उनका कार्य गाँधीजी द्वारा लगातार मुस्लिमों का तुष्टीकरण करने की नीति द्वारा सरल बन गया था। मैंने जो भी किया है उसकी पूरी जिम्मेदारी लेते हुए मैं अब अदालत के सामने खड़ा हूँ और निश्चय जी न्यायाधीश ऐसा आदेश पारित करेंगे, जो मेरे कार्य के लिए उचित होगा। लेकिन मैं यह अवश्य कहना चाहता हूँ कि मैं अपने ऊपर कोई दया नहीं चाहता और न मैं यह चाहता हूँ कि कोई अन्य मेरे लिए किसी से कोई दया-याचना करे। अपने कार्य के नैतिक पक्ष पर मेरा विश्वास सभी ओर से की गयी मेरी आलोचनाओं से किंचित भी विचलित नहीं हुआ है। मुझे कोई सन्देह नहीं है कि इतिहास के ईमानदार लेखक मेरे कार्य का वजन तौलकर भविष्य में किसी दिन इसका सही मूल्यांकन करेंगे। जय हिन्द।

नेहरू की मूर्खता की चरम सीमा : पंचशील

यों तो पंडित नेहरू की अधिकांश नीतियाँ अदूरदर्शितापूर्ण और मूर्खतापूर्ण थीं, लेकिन उनकी महामूर्खता का परिचय उनके ‘पंचशील’ सिद्धान्त से मिलता है। 1954 में भारत और चीन के बीच एक सन्धि की गयी थी, जिसके पाँच सिद्धान्तों को सम्मिलित रूप में पंचशील कहा जाता था। ये पाँच सिद्धान्त थे- 
1. एक-दूसरे की अखंडता और प्रभुसत्ता का सम्मान करना, 
2. एक-दूसरे पर आक्रमण न करना, 
3. एक-दूसरे के मामलों में हस्तक्षेप न करना, 
4. समानता के आधार पर परस्पर लाभ के लिए कार्य करना, तथा 
 5. शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व। सिद्धान्तों के रूप में तो यह सब अच्छा है, लेकिन नेहरू यह समझने में असफल रहे कि चीन दुनिया का सबसे कमीना देश है और उसके किसी नेता का एक शब्द भी विश्वसनीय नहीं है। उसके लिए किसी समझौते का मूल्य उस कागज के बराबर भी नहीं है, जिस पर वह समझौता लिखा गया है। यदि नेहरू ने चीन का इतिहास पढ़ा होता, तो वे उसके विस्तारवाद को समझ भी लेते, परन्तु वे छद्म कम्यूनिस्ट थे और हमारे अन्य कम्यूनिस्टों की तरह यह नहीं मानते थे कि चीन भी कभी कोई गलत कार्य कर सकता है।
नेहरू को तिब्बत का परिणाम देखकर ही सावधान हो जाना चाहिए था। अपनी अहिंसा-जन्य मूर्खता के कारण तिब्बत ने कोई सेना नहीं बनायी थी, जो उसकी सीमाओं की रक्षा कर सके। इसलिए चीन ने 1951 से ही उस पर कब्जा करने की कोशिशें चालू कर दी थीं। यह उल्लेखनीय है कि तिब्बत हमेशा ही एक स्वतंत्र राष्ट्र रहा है और कभी भी चीन का भाग नहीं रहा। 1949 में एफ्रो-एशियन देशों के सम्मेलन में तिब्बत का प्रतिनिधि भी स्वतंत्र देश के रूप में शामिल हुआ था। परन्तु चीन अपने विस्तारवाद के कारण उसे अपना प्रान्त मानता रहा है। इसलिए कुछ लोगों को उकसाकर तिब्बत में विद्रोह शुरू करा दिया और 1959 में अपनी सेनाएँ भेजकर उस पर कब्जा कर लिया। वहाँ के वैध शासक दलाई लामा को अपने चन्द समर्थकों के साथ वहाँ से भागकर भारत में शरण लेनी पड़ी और वे आज भी भारत में ही रहकर तिब्बत की निर्वासित सरकार चला रहे हैं। दुर्भाग्य से नेहरू ने ‘पंचशील’ की आड़ लेकर इसे चीन का आंतरिक मामला बताया और चीन की हरकतों का कोई विरोध नहीं किया। यदि नेहरू ने चीन का विरोध किया होता, तो चीन के विस्तारवाद पर तभी लगाम लग गयी होती।
यहाँ यह याद दिलाना आवश्यक है कि यदि तिब्बत को एक स्वतंत्र देश मान लिया जाये, तो भारत की एक इंच सीमा भी चीन से नहीं मिलती। इसलिए ऐसा होने पर भारत-चीन सीमा विवाद होता ही नहीं, बल्कि तिब्बत-चीन सीमा विवाद होता। चीनी विस्तारवाद तिब्बत को ही नहीं, बल्कि नेपाल, भूटान, सिक्किम, लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश को भी अपने में शामिल करना चाहता है और यह बात कोई छिपी-ढकी नहीं है। परन्तु नेहरू आँखें बन्द करके तब तक सोते रहे, जब तक चीन ने भारत पर आक्रमण नहीं कर दिया। यह बात नहीं कि देश के अन्य नेताओं ने नेहरू को सावधान नहीं किया था। डा. अम्बेडकर, डा. राजेन्द्र प्रसाद, डा. राम मनोहर लोहिया ही नहीं संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी ने भी नेहरू को चीनी विस्तारवाद से सावधान रहने और उस पर बिल्कुल भी विश्वास न करने की चेतावनी दी थी। परन्तु नेहरू ने इस सभी को मूर्ख बताया था और कहा कि हमें चीनी नेताओं पर पूरा विश्वास है कि वे पंचशील का पालन करेंगे।
नेहरू की आँखें तब खुलीं जब 1962 में चीन ने भारत पर खुला आक्रमण कर दिया और भारत का एक बड़ा भूभाग हड़प लिया। अपनी और गाँधी की मूर्खता के कारण नेहरू ने भारत की सेनाओं को भी ताकतवर नहीं बनाया था, जिससे वे चीन का उचित मुकाबला नहीं कर सके और भारत को अपमान का गहरा घूँट पीना पड़ा। इसके बाद नेहरू ने स्वयं स्वीकार किया था कि हम मूर्खों के स्वर्ग में रह रहे थे।

Wednesday, 7 March 2012

गाँधी के बाद उनके नाम का अभिशाप

जीवित रहते हुए मूर्खात्मा गाँधी ने देश की जो कुसेवा की और हानि पहुँचायी, उससे कई गुना अधिक हानि उन्होंने मरने के बाद अपने नाम के दुरुपयोग से पहुँचायी। मेरा संकेत फिरोज खान को उनके द्वारा अपना ‘गाँधी’ कुलनाम देने से है, जिसने नेहरू की बेटी इन्दिरा से विवाह किया और उसकी सन्तानों ने नेहरू और गाँधी दोनों नामों का जमकर फायदा उठाया और देश को लूटा। इसे पूरा समझने के लिए जरा विस्तार में जाने की आवश्यकता है।
नेहरू का विवाह 1916 में कमला कौल नाम की युवती से हुआ था, जो एक सुसंस्कृत कश्मीरी हिन्दू ब्राह्मण परिवार की पुत्री थी। इसके विपरीत नेहरू पश्चिमी सभ्यता में ढले हुए थे और उनका खान-पान ही नहीं आचार-विचार सभी कमला जी के विपरीत थे। विवाह के तुरन्त बाद 1917 में उनके एक पुत्री पैदा हुई, जिसका नाम इन्दिरा था। कुछ समय बाद एक पुत्र भी पैदा हुआ, जो 2 दिन बाद मर गया। इसके बाद ही कमला नेहरू अवसाद में चली गयीं। इसका एक कारण यह भी था कि नेहरू का ध्यान राजनैतिक आन्दोलनों में और अन्य सुन्दर महिलाओं में लगा रहता था। इसलिए वे अपनी पत्नी और पुत्री पर पर्याप्त ध्यान न दे सके। इसके परिणाम स्वरूप कमला क्षयरोग से ग्रस्त हो गयीं। पहले भुवाली में उनका इलाज चला, फिर यूरोप गयीं। वहीं उनका देहान्त 1936 में हो गया। उस समय इन्दिरा 19 वर्ष की युवती थीं।
बीमार माँ और अन्यत्र व्यस्त बाप की पुत्री इन्दिरा का भटकना स्वाभाविक था। इलाहाबाद में एक मुस्लिम-पारसी परिवार उनके निवास आनन्द भवन में शराब की आपूर्ति किया करता था। उनका एक लड़का फिरोज खान प्रायः माल देने आता था, वहीं इन्दिरा से उसका परिचय हो गया। यह फिरोज एक मुस्लिम बाप और पारसी माँ की सन्तान था, परन्तु अपना धर्म पारसी बताता था। इन्दिरा की पढ़ायी भी अच्छी तरह नहीं चली। किसी तरह उसने हाईस्कूल पास किया। फिर इंटर की पढ़ाई के लिए उसे शान्तिनिकेतन भेजा गया। वहाँ उसका मन पढ़ाई में कम लगता था और अनुशासन तोड़ा करती थी। इसलिए उसे शान्तिनिकेतन से निकाल दिया गया। उसने लंदन के आॅक्सफोर्ड विद्यालय में प्रवेश के लिए परीक्षा दी, परन्तु फेल हो गयी। उन्हीं दिनों फिरोज भी वहाँ लंदन स्कूल आॅफ इकाॅनाॅमिक्स में पढ़ते थे। दोनों की मुलाकात दोबारा लन्दन में हुई, तो उनके बीच प्रेम हो गया और कहा जाता है कि वहीं एक मसजिद में दोनों ने विवाह कर लिया। फिरोज भी अपनी पढ़ाई कभी पूरी नहीं कर सके।
जब वे दोनों इलाहाबाद लौटे और नेहरू को उनके विवाह की जानकारी हुई, तो वे बहुत नाराज हुए। उन्होंने अपनी बेटी इन्दिरा को गाँधी के पास भेजा, ताकि वे समझाकर उसे लाइन पर ला सकें। परन्तु वह किसी भी तरह फिरोज को छोड़ने को तैयार नहीं हुई। तब गाँधी ने फिरोज को अपना कुलनाम ‘गाँधी’ रखने की सलाह दे डाली, ताकि वह हिन्दू लगे। एक घोषणापत्र द्वारा फिरोज ने अपना नाम बदल लिया और फिर दोनों का विवाह हिन्दू रीति-रिवाजों के साथ कर दिया गया। नेहरू का दामाद बन जाने पर उसे कई सुविधायें भी मिल गयीं और वह नेता बन गया।
मूर्खात्मा गाँधी ने शायद यह कल्पना नहीं की होगी कि इस प्रकार अपने कुलनाम का उपयोग करने की अनुमति देकर वे देश को कितनी हानि पहुँचा रहे हैं। उनका सारा जीवन झूठ पर आधारित था, इसलिए अपनी पुस्तक ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ में गाँधी ने इस घटना का संकेत भी नहीं किया है। नेहरू के कोई बेटा नहीं था, इसलिए इन्दिरा-फिरोज का परिवार ही उनका परिवार माना गया। नेहरू ने इन्दिरा को अपने उत्तराधिकारी की तरह तैयार किया, हालांकि उसमें इसकी पर्याप्त योग्यता नहीं थी। इस प्रकार फिरोज के परिवार ने गाँधी और नेहरू दोनों के नाम का जमकर लाभ उठाया। भारत की जनता क्योंकि मूर्ख और भावुक है, इसलिए वह इन्दिरा को नेहरू और गाँधी दोनों की बेटी मानती रही।
फिरोज-इन्दिरा के दोनों पुत्रों राजीव और संजय ने किस प्रकार देश को लूटा, लोकतंत्र की हत्या की और करोड़ों-अरबों की जायदाद एकत्र की इसकी कहानी सब जानते हैं। यदि मूर्खात्मा गाँधी ने अपना नाम उनको न दिया होता, तो शायद ऐसा न होता। इस प्रकार गाँधी ही नहीं उनका नाम भी देश के लिए अभिशाप सिद्ध हुआ।

Tuesday, 6 March 2012

गाँधी वध और उसके बाद

अंग्रेजों द्वारा भारत छोड़ने और सत्ता के हस्तांतरण के साथ ही यह स्पष्ट हो गया था कि देश के विभाजन और लाखों हिन्दुओं के कत्ल और माता-बहिनों के अपमान के लिए कांग्रेस और उसके सत्तालोलुप नेता, विशेष तौर पर गाँधी जिम्मेदार थे। इससे सभी देशभक्त भारतीयों का हृदय क्रोध से उबल रहा था। हद तो तब हो गयी, जब पाकिस्तान ने कबाइलियों के नाम पर कश्मीर में हमला कर दिया और मूर्खात्मा गाँधी उसी समय उसे 55 करोड़ रुपये भुगतान कराने के लिए अड़ गये। जो गाँधी देश की हत्या और हिंसा रोकने के लिए प्रतीकात्मक अनशन भी न कर सके, वे पाकिस्तान को 55 करोड़ दिलवाने के लिए अनशन पर बैठ गये। यह देशद्रोहिता की हरकत नहीं तो क्या थी?
सभी देशभक्त भारतीय अनुभव कर रहे थे कि गाँधी अब देश के ऊपर बोझ बन चुके हैं। लेकिन लोग समझ नहीं पा रहे थे कि गाँधी द्वारा आगे भी भयादोहन करने से कैसे बचा जाये। ऐसे में एक प्रखर देशभक्त नाथूराम गोडसे ने इस मूर्खात्मा को संसार से उठा देने का निश्चय कर लिया। नाथूराम गोडसे कोई सामान्य अपराधी नहीं थे, बल्कि सुशिक्षित, विद्वान्, पत्रकार और एक समाचार पत्र के सम्पादक थे। वे यह जानते थे कि गाँधी वध एक कठिन कार्य है और इसको करने वाले को कठोर दण्ड तो भुगतना ही होगा, साथ में चारों ओर से भत्र्सना का भी सामना करना पड़ेगा। फिर भी उन्होंने यह कार्य करने का दृढ़ निश्चय कर लिया। वे चाहते तो पेशेवर हत्यारों द्वारा यह कार्य करा सकते थे, परन्तु उन्होंने स्वयं यह कार्य करना तय किया, क्योंकि वे किसी और को बलि का बकरा नहीं बनाना चाहते थे। इतना ही नहीं, गाँधी वध के बाद वे वहाँ से भागे नहीं और न किसी और को कोई हानि पहुँचायी, हालांकि उनके पास भागने का पूरा मौका था। इससे उनके चरित्र की महानता का पता चलता है।
30 जनवरी 1948 को हुए गाँधी वध के बाद नेहरू तथा कांग्रेस के नेताओं को हिन्दू राष्ट्रवादियों के साथ अपनी दुश्मनी निकालने का पूरा मौका मिल गया। हालांकि नाथूराम गोडसे का उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से कोई सम्बंध नहीं था और इस कार्य की योजना उन्होंने हिन्दू महासभा के कुछ समर्थकों के साथ मिलकर बनायी थी। लेकिन नेहरू के लिए इतना ही पर्याप्त था कि बचपन में नाथूराम कभी शाखा जाया करते थे। इसी बहाने से उन्होंने संघ को न केवल बदनाम किया और उस पर प्रतिबंध लगा दिया, बल्कि संघ के तत्कालीन सरसंघचालक परमपूज्य श्री गुरुजी को भी जेल में डाल दिया। इतना ही नहीं, अहिंसा का जाप करने वाले गाँधीवादी कांग्रेसियों ने गाँधी वध के बाद हिंसा का नंगा नाच किया और विशेष तौर पर संघ से सम्बंध रखने वाले मराठी ब्राह्मणों को निशाना बनाकर हत्यायें तथा उपद्रव किये। लेकिन संघ कार्यकर्ताओं की महानता देखिये कि उन्होंने बदले में कांग्रेसियों पर हाथ नहीं उठाया, बल्कि केवल अपनी रक्षा की।
इस कांड की जाँच प्रारम्भ होने पर शीघ्र ही यह स्पष्ट हो गया कि गाँधी वध में संघ का कोई हाथ नहीं है और यह हिन्दू महासभा के मुट्ठीभर कार्यकर्ताओं का काम था। लेकिन पोंगा पंडित नेहरू की क्षुद्रता देखिये कि उन्होंने संघ पर से प्रतिबंध तब भी नहीं हटाया और न श्री गुरुजी को रिहा किया। इस कारण संघ के कार्यकर्ताओं को सत्याग्रह करना पड़ा। इस सत्याग्रह में इतने स्वयंसेवकों ने अपनी गिरफ्तारी दी जितने किसी भी आन्दोलन में कांगे्रस के कार्यकर्ताओं ने भी नहीं दी थी। तब नेहरू ने बहाना बनाया कि संघ का कोई संविधान नहीं है, इसलिए संघ गैरकानूनी है। इस हिसाब से तो नेहरू की सरकार भी गैरकानूनी थी, क्योंकि तब तक भारत का भी कोई संविधान नहीं था। फिर भी संघ के कुछ कार्यकर्ताओं ने संविधान तैयार किया और तब श्री गुरुजी की रिहाई हुई और संघ से प्रतिबंध हटा।
नाथूराम गोडसे पर गाँधी वध का जो केस चला, उसमें एक बार भी संघ का नाम नहीं आया। फिर भी पूरी निर्लज्जता से कांग्रेसी और उनके चमचे कम्यूनिस्ट आज भी संघ को ‘गाँधी का हत्यारा’ बताते रहते हैं। अपने बयान में नाथूराम गोडसे ने अपने कार्य के समर्थन में जो कुछ कहा उसे सुनकर अदालत में मौजूद सबकी आँखें गीली हो गयीं। न्यायाधीश महोदय को लिखना पड़ा कि यदि उस समय अदालत में उपस्थित लोगों को जूरी बना दिया जाता, तो वे प्रचण्ड बहुमत से नाथूराम को निर्दोष होने का फैसला देते। फिर भी न्यायाधीश ने कानून का सम्मान करते हुए नाथूराम को फाँसी की सजा सुनायी और नाथूराम गोडसे ने उसे स्वीकार किया।
मूर्खात्मा गाँधी तो चले गये, लेकिन हमारे देश की जनता में सदा के लिए हीरो बन गये। यह इस कांड का उल्टा परिणाम हुआ। नाथूराम गोडसे यदि उस समय उनका वध न करते, तो एक-दो साल में गाँधी स्वयं घुट-घुटकर मर जाते। लेकिन एक बात और है कि नाथूराम ने गाँधी के वध का पाप अपने सिर लेकर एक अन्य तरह से भी देश का उपकार किया। कल्पना कीजिए कि यदि गाँधी किसी धर्मान्ध मुसलमान के हाथों से मारे जाते, जिसकी पूरी संभावना थी, तो देश में कितनी भयंकर हिंसा होती।
मरने के बाद भी गाँधी और उनका नाम देश के लिए अभिशाप बने रहे और आज तक बने हुए हैं। इसकी चर्चा आगे की जाएगी।

Sunday, 4 March 2012

गाँधी का सबसे बड़ा अपराध


मूर्खात्मा गाँधी ने देश के प्रति जो अनेकानेक अपराध किये थे, उनमें से कुछ की चर्चा मैं अपने लेखों की पिछली कड़ियों में कर चुका हूँ। अब सवाल है कि गाँधी का सबसे बड़ा अपराध क्या है? मेरे विचार से देश के प्रति गाँधी का सबसे बड़ा अपराध यह है कि उन्होंने नेहरू जैसे अयोग्य, विलासी और पश्चिमी मानसिकता वाले व्यक्ति को प्रधानमंत्री के रूप में देश पर थोप दिया। ऐसा करके गाँधी ने अपनी तानाशाही प्रवृत्ति का एक बार फिर निर्लज्ज परिचय दिया।
उल्लेखनीय है कि 16 कांग्रेस कमेटियों में से किसी ने भी नेहरू के नाम का प्रस्ताव प्रधानमंत्री पद के लिए नहीं किया था। 13 कमेटियों ने सरदार पटेल के नाम का प्रस्ताव दिया था, जो इस पद के लिए सर्वाधिक योग्य थे और निर्विवाद रूप से देशभक्त थे। जब नेहरू को पता लगा कि किसी ने भी उनके नाम का प्रस्ताव नहीं किया है और सरदार पटेल प्रधानमंत्री बन सकते हैं, तो वे गाँधी के सामने जाकर गिड़गिड़ाये और एक प्रकार से धमकाया भी। इससे गाँधी डर गये और कांग्रेस को नेहरू का नाम स्वीकार करने पर अड़ गये। सरदार पटेल, डा. राजेन्द्र प्रसाद तथा अन्य नेता गाँधी का बहुत सम्मान करते थे, इसलिए उन्होंने गाँधी की बात मान ली और पीछे हट गये। गाँधी ने नेहरू को प्रधानमंत्री बनने का कारण यह बताया था कि यदि उनको प्रधानमंत्री न बनाया गया, तो वे रूठकर कांग्रेस से अलग हो सकते हैं और कांग्रेस और देश का नुकसान कर सकते हैं। इससे स्पष्ट है कि वास्तव में नेहरू ने गाँधी और कांग्रेस को ब्लैकमेल किया था।
अब जरा देखा जाये कि देश की आजादी के आंदोलन में नेहरू का क्या योगदान था। कांग्रेस के आन्दोलनों का इतिहास बताता है कि हर आन्दोलन में नेहरू सबसे आगे रहकर सबसे पहले जेल चले जाते थे। बस यही उनका योगदान था। वे सबसे पहले जेल जाकर हीरो बन जाते थे। जेल में वे ए क्लास की सुविधायें भोगते थे और पार्टी के बाकी लोग अंग्रेजों की लाठियाँ और अत्याचार सहन करते थे। नेहरू के लिए जेल यात्रा पिकनिक से कम नहीं थी। उन्होंने आजादी के लिए कभी कोई कष्ट सहन नहीं किया, लेकिन सौदेबाजी करने और सत्ता की मलाई चाटने में सबसे आगे रहे। लेडी माउंटबेटन से उनका प्रेम प्रसंग था। उनके माध्यम से उनका लार्ड माउंटबेटन पर प्रभाव था, जिसका उन्होंने पूरा फायदा उठाया और सफल सौदेबाजी में सत्ता हथिया ली।
नेहरू ने प्रधानमंत्री बनने के बाद देश का जो बेड़ा गर्क किया, उसे सब जानते हैं। उनकी ‘योग्यता’ का सबसे बड़ा सबूत कश्मीर आज भी हमारा सिरदर्द बना हुआ है। सरदार पटेल ने 542 रियासतों को एक कर डाला, लेकिन केवल एक मामला (कश्मीर का) नेहरू ने जबर्दस्ती अपने हाथ में रखा, और उनकी नालायकी देखिए कि वही लटक गया और आज तक लटका हुआ है। अगर कश्मीर का मामला भी सरदार पटेल के हाथ में होता, तो कब का हल हो गया होता। नेहरू ने अपनी मूर्खतापूर्ण नीतियों से देश का जो अपमान कराया और विकास के नाम पर विनाश का बीज बोया, उसकी चर्चा आगे की जाएगी।
मूर्खात्मा गाँधी ने पोंगा पंडित नेहरू जैसे अयोग्य व्यक्ति को बलपूर्वक प्रधानमंत्री बनाकर देश की जो कुसेवा की, उसका फल हम आज तक भोग रहे हैं और कौन जानता है कब तक भोगेंगे।